ज्ञानसार | Gyansaar

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
14 MB
कुल पष्ठ :
350
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)` ` न्यायाचां न्याथविशारद ` ` ` ` `
श्रौमद् यशोविजयजो
भक भ +> जकः सा+ খরার + दिऽ ` ,/ ९7
भारतीय संस्कृति हमेशा घमेप्रधान संस्कृति रही है।
. चूकि धर्म से ही जीवमात्न का कल्याण हो सकता है।..
बर्म से ही मनृष्य को शान्ति व प्रसन्नता प्राप्त हो संकती है।
धर्म के माध्यम से ही मनुष्य को वास्तविक सुखी बनाया जा
सकता है ।. जीवों की कक्षा के अनुसार धर्म का.पालन भिन्न
भिन्न होता है । सव जीवों के लिए एक ही धर्माचरण नहीं
होता- है ।
5 অঁজাহ ঈ जीवों को .वर्ममार्ग बताने का कार्य पवित्र
_ जीवन जीने-वाले साधुपुरुष. करते आये हैं श्रौर करते रहे हैं।
साधुपुरुष स्वजीवन में उच्चतम धर्म का.पालन करते हैं. और.
संसार की धर्म का मार्ग बताते हैं, यह है साधु पुरुषों की
' विश्वसेवा | .
` , धमे का उपदेश देना और धर्मग्रन्थों का निर्माएोँ करना-
साधुजीवन की मुख्य प्रवृत्ति | इस अवृत्ति के अलावा
. साधुपुरुष अपनी आत्मविशुद्धि .के 'लिए ज्ञान-व्यान* योग
.. सांधना वगैरह मे निरतः रहते हैं। हिसां-भू :-चो री-दुराचा र<
` .परिग्रह.के पापोंसे वे स्वेथा निवृत्त होत हँ ।` विना पापः किए
: भी मनुष्व जीवन जी सकता है; इस बात को. प्रत्यक्ष प्रमाणं
हैं हमारे भारत के एकमात्र जेन मुनि। ` - : {|
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