संस्कृति का पांचवां अध्याय | Sanskrati Ka Pachwa Adhyaya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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{ १५ ] महाविद्यालय के आचाय प> नरदेव शास्त्री भी गुव हैं।। इनका अपना असली नाम 'नरसिंह राव' है। लाहौर में इनके विद्यागुर आये-विद्वान ने 'नरदेव' नाम कर दिया था 1 में ने पं० जगन्नाथ राव से कहा -'तो फिर राव जी तो आप के ही वर्ग के हैँ ।' (महाविद्यालय में पं० नरदेव शास्त्री को सब लोग “राव जी” ही कहते हैं)। मेरे प्रश्न के उत्तर भे प० जगन्नाथ राव ने कहा--“ हाँ हम दोनो যান লী है, परये वेदा के माया-जाल मे पड़े हैं, में बाहर निकल कर प्रकाश भें आ गया हं मै ने प॑> जगन्नाथ राव से विदेशी मिशनरियों के লাই मे भी वात-चीत की थी। में ने कहा -ये, लोग तो अराष्ट्रीयता फेलाते है । आप का इन से क्‍या मेल ?! उन्होंने कदा--'उन लोगों की ज|तीयता (नेशनेलिटी) जरूर भिन्न है, पर हम तो ईसाइयत के प्रचार मे साथ हैं। जातीयता में हम अलग, (ख जातीयता मे हम श्राप के साथ द। मजदव मँ अलग ड । संक्षेप यह कि 'भारत' एक राष्ट्र भारतीय जाति” यानी भारतीयता' जाति ओर इस जातीयता को अभिव्यक्त करने चाली एक “अपनी” संस्कृति है | | बाहर के लोग जिस घर में जिसका जन्म होता है, वह उस पर स्वा- मित्व रखता है और अपने कुल की मर्यादा का ध्यान रखता - है, अपने पुरखों के सस्कार लेकर चलता है । परन्तु ऐसा भी देखा जाता हैं कि किसी दूसरे घर मे पैदा हुए लड़के को लोग गोद ले लेते हैं और वह इस नये घर में आकर इसका मालिक वन जाता है। परन्तु गोद आए हुए लड़के को इस नये घर को ही अपना” घर सममना द्वोता है । इसी घर के पुसो को बह अपनाता है और इसी के आचार-विचार ग्रहण करता है । ५




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