विद्याधरी | Vidhyadhari

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Vidhya Dari by Girijanandan Tivari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हू हें जे इनका ऋण भो बेतद्ाशा बढ़ने लगा । आन मेवेवाले तकाज़ाकी भ्ाते, कल डाकटरका बिल पहुंचता, भोरको कपड़ेवाले मांगते, सन्ध्याकों बफंवासी तकाज़ा करते । किसीने तमस्मुक को नालिश कौ नोटिस दो, किसोने दो चार खरी खरी मनाई, यहां तक कि उनका दिनको घर मे बाहर निकलना भारो हो गया था । रायसाइवकों नथेने वेतदाशा दुबेख कर दिया था, दिन भर आप नशेद्दोमें चूर रहेते थे। जब आप सो कर उठे पेख़ाने से छुट्टी पा पहले अफीम खा लेते थे तब जञस- पान किया फिर भोजन तक बराबर दमपर दस गांजा भॉका करते थि । भोननकर दो पह्रको अरास करते थे। सोकर उठने पर मदक चलती थो । फिर शामकी शराव पौना तो अवश्यद्दो था । दूसरे सूजाक, गर्मी, बाघो एक नणएक बीसारो बराबर बनोछों रइतो थी जिससे शरीर सतप्राय दो गया था । एक दिन आप चुन्नौके यद्दां पहुँचे तो वा देखते क्या हैं कि व वैठो एक मज्ुष्य से सो कर रहो है, इन्हें यह देख बड़ा रंज झुआ। चुन्नोने इनको कुछ पर्वाच न की, उससे अठखेलियां करतीछो रही । रायसाइवस रा न गया आपेसखे वाइर हो गये, कुक कइछौ बैठे । चुन्नोमे थो इनको सुझतोड़ जवाब देना शुरू किया । यद्ांतक नौवत प- इंचौ कि चुन्नोने रायसाइवको सकान ये निकल जाने कहा । कि व व वन




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