दक्षिण भारत में जैनधर्म | Dakshin Bharat Me Jain Dharm

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Dakshin Bharat Me Jain Dharm by कैलाशचन्द्र सिद्धान्ताचार्य - Kelashchandra Siddhantacharya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सर्वज्ञ सर्वदर्शी हो जाते हैं तथ अनेक अतिशय प्रकट होते है जिन देवकृत होते है । उन्हींमें-ले एक अतिशय इस प्रकार हैं कि जब भगवान्‌ विहार करते हैं तो उनके चरण-स्थलके नोचे देवगण फमलीकी पक्रित रच देते यही बात 'मवतामर' स्तोन्न” में भगवान्‌ ऋषभदेवको स्तुति बरतें हर बही गये हैं। अतः 'मलरमिसइ येगिनान' का बर्थ अहँतर्मे हो सुघटित होता हे दूसरे पद येनगुनवान का अर्थ होता है - आठ गुणसहित। या पिशेषण भी जिनका ही हो सकता है। जन सिद्धान्तके अनुसार परमात्मामें आठ गृण माने गये हैं - अनन्तदर्शन, अनन्तज्ञान, अनन्तवीर्य, मम्यवत्व, अगुसलपु, झयगारना, सूक्ष्मतत्र । अत, जिनका यह कहना हूँ कि वल्लुप्ररने हिन्दू देवताओोका उल्टेस किया हैं उनके मतसे कंसे सहमत हुआ जा सकता हूँ ? बुरे जन्तु হীন सम्बन्धमें एक अन्य भी प्रमाण यहाँ उपस्थित क्या जाता है। जून ग्राय नीछ- केशोका टौक्राकार कुरटफो 'एम्मोत्त' - अपना पूज्य ग्रस्य बतछाता है। इसमे प्रकट है कि जैन लोग वहलुअरकों अपने घर्मका अनुयायों मानते थे । ऐसी परम्परा प्रचलित हैं कि जेन साथ एलावार्य बरलके रचयिता हैं। स्थ० प्रो० ए० चक्रवर्तीका कहता हैँ कि जैनवर्मके प्रमुख आवायं कुकुन्द हौ एना. चार्य है । नौर उन्होने प्रथम शत्ताव्दोके लगभग बुःरलफी रचना को थी । तथा अपने शिष्य वल्लुभरके द्वारा उसे मदुरा सघके समक्ष उपस्थित ब्रिपा था और इसक्रा कारण तत्कालीन परिस्थितियाँ थीं। भद्रवाहुकी दक्षिण-यात्रासे यह तो स्पष्ट हैँ कि ईसवी सन्‌के प्रारम्भ काल तक जैनघर्म दक्षिण भारतमें फैल चुका था, भौर अब उसका जनतामें विशेष प्रचार करनेके लिए यह आवश्यक था कि उसे उस देशकी ही भापामें इस ढगसे निबद्ध किया जाये कि वह केवल जैनोका हो ग्रन्थ प्रतोत न हो । इस भावनासे तमिलमें कुरल जैसे नीति धर्मविपयक ग्रन्थकी कुन्दवुन्द-जैसे विद्वानके द्वारा रचना होना ओर उसी उददेश्यसे उसे तमिलवासी वल्लुभरके द्वारा उसीको कृतिके रूपमें उप- स्थित कराना यथार्थ प्रतीत होता है। कहा जाता हं कि वल्लुमर कोर नोच जातिका व्यवित था। इसका उत्तर देते हुए श्रो रामस्वामी आयगर ने लिखा है कि तमिल देशको प्राचीन सामा- पु ক (म 1 [ने १ उश्निद्रहेमननपदट्‌कजपुन्नकान्तिपयुःल्सन्नलमयूलशिखाभिरामो । पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र धत्ते पश्रानि तत्र विबुधा परिकर्पयन्ति ॥३६॥ २ बुन्दकुन्दकरत पचासितिकायके अंगरेज़ी अनुवादकी प्रस्तावनामें । ३ स्ट० सा० ६० जें०, पृ० ४३। तमिल प्रदेशमे जेनधर्मं ९ र न न




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