सुभाषितावली | Subhashitavali

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Subhasitavali by जेनेतिहाससार - jenetihassar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ९ ) ) हिं० अधथे-पमसे मनृष्यको पुत्र, पत्र, ग्रह, वाहन, वस्तु, राज्य, अलं- कार वगैरा सब्च कुछ मिलता वर छ्टदसमर तु भ्रमेयुक्तस्थ जीवित ॥ तडीौनस्थ हथा वषकाटाकोटि विद्पतः। २०॥ ॥ || म० अथे-पाभिक मजुष्यायें एक मुहत्तोच आयुष्य बर; परंतु, पातका আট ১ পপ ©= & ७9 # ९ থা मनुष्याचे कोव्यावर्धि वषापेक्षां ज्यास्त असले तरी ভ্যখ होय हिं० अथ-धार्मिक मनष्यका एक महतेमात्रका नीवितभी बहत्तर हे; परंत, पातकी मनप्थका कोव्यवेधी वषमे जियादा निवित हो तोभी वह व्यथे है यमद्मशसजातं स्वकल्याणबीज सुगातिगमनहेतलु लाथनायेः प्रणीतं ॥ सवजलनिधिपातले सारपाथ- বহু युटमतुलसुखानां घमेमाराधयत्वं ॥२१॥ , प० अथ-यम, नियम, शांति घांपासून उत्वन्न दोणाच्या धमचा तु अंगिकार कर; धथ दहा सवै कस्वाणांसं मृ अ.हे; मोक्षसाधनास कारण आहे; तीर्यकरांनी आचारिलेला आहे;। संसारसम॒द्रांत नोका आहे; मोर्ठे उत्तम प्कारचें फराणाचें आहे; अमयाद युखायचें घर अहि हिं० अर्थ-यम, नियम, और হানা उत्पन्न होनेवाछे धमेका নু অনি कार करः; धम सब कल्याणकी जड़ है; मोक्षतापनकों कारण है, तीथंकराने कहाहवा ह; समारसमद्रम नका है; उत्तम प्रकारका तोंपा है; ओर अनंत सखका स्थान है! ॥ इलि घस वणन ॥ पाय वणनं। पाप হাল তব विदडिश्वश्राति८ग्गातिप्रद | रागक्लशादि भाण्डारं सत्यरःखाररं णा ॥ २२॥ प्० अथं-पातक हं माठं वरी आहे অল नागः; ह नरकगतीसि ब पशुगतीस नत; रागव व दुःखाच भांडार आहे; षर मनुष्यांस खराः रपर इःखद्‌ायक आदे. हि० अर्थ-पानक শহু অহা হাসু ই তলা जान ले; यह नरकगति व 2




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