हरिवंश पुराण [खंड २ ] | Harivansh Puran [Vol 2]

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Book Image : हरिवंश पुराण [खंड २ ] - Harivansh Puran [Vol 2]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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বর ৯৮৫১5৩৮৬৮৫৯ 9১4৮৮৫৬৬৬৫৬ ৩৬০,৬৫৮ ৫৬ वजि, ४, १० 1 _ हरिवेदा ओर जिनसेनाचाये । ১ এ পি হা ्छ्छम्कन्कण्कन्कनकर नजकम कक के ११ 1 वपं नहीं है जिसका कि स्वामी भिनसेनने उल्लेख किया हे घरिकि सका पितामह (वावा) || | वहम, जिसकाकि दूसरा नाम अमोचवष भी था ( जैसा कि आगे हम सिद्ध करेंगे ) ६ | उनका शिष्य था । क्योकि राष्ङूखवंशीय राजा लोग करई २ नार्मोसे प्रसिद्ध इषः है उनम | १| ककराजके बाद जितने राज। सिहासनारूढृ हुए है प्रायः उन सर्वोक्ी वष उपाधि रदी || । जैसा कि नीचे लिखी तालिकासे मालूम पड़ता है-- कर्कराज | इंद्र (२) कृष्णराज अकालबर्ष शुभतुंग ( राज्यारेभ ६७५ शक ) (१) खड़ावलोक, दंतिदुर्ग ৯558৯ । এ = (३) गोविंद श्रीवद्धम अमोघवषे (“)( ७०५ शक ) ( ४ ) धुव कलिनल्लभ धाराथष निरुपम गुजरशाखा পলি ^~ ~ ~~~ = ~~~ -~~ ~-- ~---- ~ = ~~~ লহ, ক हे (५) गोविद श्रीवल्लभ प्रभूतवेषे जगतनुंग ( ५१६ शक ) নি (६ ) शर्वेमहाराज अमोधवर्ष ठ्पतुंग ( ७३६ शक ) (७) कृष्ण अकालवर्ष शुभनुंग ( ७१५ शक ) | ककराज सुवर्णवर्ष गोविद प्रभूतवर्ष जगनूनु॑ग ( पिताके जीवित ही मर गया ) है ৃ কনর ৃ (८) इंद्राज, नित्यवर्ष ( ८३६ शक ) अकालवर्ष, झुभतुंग ~ --- শশা | ४ धव, धारविषै निश्पम ( १) अमोधवषे ( ८४० ) रक | ( ११ वहिग अमोघवर्ष ( ८५६ शक ) (१० ) गोविद प्रभूतवष नृपलुंग [ ८४१ शक ] प = च च এ নিল জর এ ४ ॥ | [ १२] कृष्ण अकालवर्ष शुभलुंग [ ८६१ ) जगतलुंग [ १३ ! खोड़िग नित्यवर्ष [ ८८२] [१४ ] कक अमोधवप वरपतुग, [राज्यांत ८५६ शक ] वालिकामें दिखलाये गये राजाओंके नामों ओर उनके पहिले लिखे गये नंबरोंसे भली भांति क्वात होता है कि एक ही चंदकी एक ही व्यक्तिने अनेक नाम धारण किये हैं ओर कर्क- राजके परचर्ती समस्त राजाओंके नामांतम 'बर्ष' शब्द रहा है। यद्यपि केवल हरिवशकार |: जिनसेनके समसामयिक कष्णराजके पुत्र धी गोविद या भीवलभका वषातनाम आजतक किसी तान्नलेख वा शिलालेखम नहीं पाया गया है तथापि उसका कोरे न कोर बात नाम ५१ পর এ হত প্রচ कन्क रक रकन र कक्कर




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