हमारा ग्राम-साहित्य | Hamara Gram Sahitya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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है. हरे )२९--खेती की कद्दावतें !२४--बुमौवल् श्रौर ढकोसले |२४--नये-नये शब्द श्रौर मद्दावरे ।२५.---मनुष्य श्रौर पशु के रोगों के नुस्खे, । २६--पेशेवरों के शब्द ।२७--जड़ी-बूटियों की पहचान श्रौर उनके उपयोग । र८--मुसलमानों के घरों में प्रचलित गीत ।गाँव का स्वरूपझसली हिन्दुस्तान शहरों में नहीं, गाँवों में है । शहरों में अरब शऔर योरप घुस श्राये हैं; पर गाँव की मूल संस्कृति श्र प्रकृति श्रमीतक उसी हालत में है, जिस हालत में वह चन्द्रगुंस और श्रशोक के जमाने में रही होगी । श्रन्तर पड़ा है तो केवल घन का | पहले-जैसा धन श्रब गाँवों में ' नहीं दे, बल्कि घोर निध॑नता है। पर निर्धनता का उसकी नींव पर झमीतक बहुत दी कम प्रमाव पड़ा दे |गाँव को गाँव की हृष्टि से देखिये, तमी वह सुन्दर मालूमहोगा । गाँव को भ्रन्द्र से देखिये, तभी उसकी सम्पूणुता समक में झमी जो इम गाँववात्लों को श्रसम्य; गंदे श्र पाते हैं, उसका पहला कारण ते उनकी झसझ गरीबी है; और दूसरा यह कि हम उन्हें योरप की आँखों से देखते हैं, इसीसे उनमें श्रसंखय तरुटियाँ दिखाई पढ़ती हैं | हम' में: उनकी घुदियाँ ही देखने का श्रम्यास भी ढाला गया है | उनकी तरुदियाँ ही जुटियाँ हमें बताई भी जाती हैं श्रौंर हम उन्हे श्रपनी प्रखर प्रतिमा से बढ़ाते भी रहते हैं, इससे उनसे हमें घृणा दोती जाती है ।'




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