बंशी | Banshi

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
7 MB
कुल पष्ठ :
136
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)७ | ५227७राधा---( २६ )
लख माधुरी मूरति मोहनः की, बनी प्रेम के रोग की रोगिनी कोड ।
निशा शारदी मे गल्बोँही दिये, रस रासविलासकी भोगिनी कोई॥
कुललाज कुटुम्ब सभी तजक, हुई कृष्ण वियोगमे जोगिनी कोड ।
जमुना तट रोरही देखो खड़ी, वह सुन्दरी श्याम वियोगिनी कोई ॥
( ३० )
सहती न वियोग कभी शशि का, उर सें नित ही लपटाती निशा।
हँसती उस चाँद की चाँदनी में, दृढ़ प्रेमका पाठ पंढ़ाती निशा ॥
ब्रजचन्द् -विहीन हमें लख के, मुसकाकर जी है जलाती निशा।
निज अंक में देखो मयंक लिये, इठलाती हुईं चली जाती निशा ॥
३१ )
मूरति तेजमय्री तुम्हरी, मनसों मन-मन्दिर माँदि परूगी।
नीरद नेनन के जलसों, पग धोय सब श्रम वेगि हरूगी॥
शोशित अध्य ओ धूप हियो, विरद्दानल मुण्डन-माल भरू गी।
आवहु थेगि दया करिके, इमि स्वागत तेरो वमन्त करू गी ॥
( ३२ )
राम धरा अवतार जब, तब खूब सिया का शरीर जला है।
रावण की भगिनी संगहू, कदु वातं बनाय के वक्त टला है ॥
बेर] बजाय के मान हरे, अब राधा सरूप॑ अनूय छला है।
नन्दलला की विचित्र कला, कव काको भला तुम कीन्ह भला है ॥
( ३३ )
नित माखन मिश्रो खिला करके, यशुदा से गये वलवान बनाये ।
इसी कारण निश्चल होकर के, नख ही चै रहै गिरिराज उठाये ॥
यह् सुन्दरता यह् चं चलना, किस गोपी से श्राप चुराकर लाये ।
प्रिया राधाके चीर चुरायेजो थे, वह् जाकर द्रोपदी को पहिनाये ॥
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