भू - आकृति विज्ञान | Geomorphology

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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परिभाषा, विपय-श्षेत्र, भ्वाकुतिक इतिहास तथा अध्ययन की विधियाँ प स्थलो पर नदियाँ सतह से सुप्त हो जाती हैं तथा भूमिगत सरिता (एश्तशट्ठाण्णार्त $प6475) की रूप धारण कर लेतो है। जलदृष्दि से प्राप्त जल मे बचपि सरिताओं का आविर्भाव हो मकता है परन्तु ऐसी नदियाँ केवल अस्थायी धारा के झप में ही हो गकती हैं। नदियों द्वारा होते वाले अपरदन का भी अरस्तु ने उल्लेख किया है | उसने बताया है कि नदियाँ अपरदन द्वारा स्थल से पदार्थ সাম करती हैं तथा उनका सागरो या झीलो म निष्लेपण करती है । नदियों द्वारा निश्लेषित पदार्थ काँव के रूप मे होता है । जलखोतो की उत्पत्ति से सम्बन्धित अरस्तू का विवरण अधिक दिलचस्प है। जल-खोत ($9177185$) का धरातल पर प्रकट होने वाला जल तीन লীলা ম সাম होता है ( (1) वर्षा बे समय अधिकाश অন্দ গলা ন रिसिकर धरातल के नीचे चला जातः है । (४) वायुमण्डल की कुछ वायु सुराखों द्वारा धरातल के भीतर पहुँच जातो है। इस पंचन वे. पनीभवन (0010218410॥) से कुछ जल प्राप्त होता है। (भा) धरातल के नीचे स्थित कुछ जल वाप्पो (७७०७7) से कुछ जन प्राप्त होता है इन मोतो से प्राप्त जल का प्ेतों मे सचयन होता है, जहाँ से जलस्रोतो का आविर्भाव होता है। अरस्तू ने सायर- त्तट में उत्तार-चढाव ((8॥ थ॥10 छ56 1 ३68 16९०) का भी पर्यवेक्षण किया है। उसने बताया कि यहाँ पर आज सागर हैं वहाँ पर पहले शुप्क स्थलीय भाग रहा होगा । इतना ही नही वर्तमान (अरस्तू के ममय) सागरो से स्थलीय भाग (जों कि जलम*न हो गये है) का पुन आविर्भाव हो सकता है । इस तरह अरस्तू ने सागर-तल की अस्थिरता को स्वीकृति प्रदान की । स्ट्रैंदो (54 ई०पू० से 25 ई०पू०) नामक इतिहास- कार का सरिताओ बे सम्बन्ध मे योगदान सराहनीय है । उसने बताया कि नदियाँ स्थलीय भाग का अपरदन करे अवसाद प्राप्त करती है तथा उन्हें कांप के रूप मे सागर में जमा कर देती हैं। नदियों द्वारा निभित डेल्टा का आकार भिन्न-भिन्न हुआ करता है। उप्मे वित्रास, सविम्तार तथा हास भी होता रहता है। डेत्दा का आकार उस भाग पर आधारित होता है जिससे होकर सरिता प्रवाहित होती है। यदि वह भाग अत्यधिक विस्तृत है और उम्र भाग की चट्टान कोमल है तो अपर- दन दारा अवसाद अधिक प्राप्त होगा । परिणाम-्स्वरूप हेल्दा का आकार अधिक विस्तृत होता है।इस विवरण से यह स्पष्टः आभार हो जाता हैक नदियों का अपरदनात्मक काये कोमल चटटानो पर अधिक होता है । इस विवरण से परोक्ष रूप के विशेषात्मक अपरदन (41765001121 ৫:০১1০2) की भी झोनों झलक मिलती है | स्थलीय भागों मे स्थानीय उत्थान एवं अवतलन होता रहता है। विसूवियस पर्वत की संरचना का अवलोकन करने के बाद सट्रैवों ने बताया कि इसको उत्पत्ति ज्वालामुखी क्रिया द्वारा हुई है। सेनेका नामक विद्वान ने अरस्तू के उस मत का समर्थन किया कि जलदृप्टि द्वारा सरिताओं का आविर्भाव नहीं हो सकता है । उसने नदियों वे अपरदनात्मक कार्य का भी भली प्रकार अवलोफन क्रिया है। उसने बताया कि नदियाँ अपचर्षण (#७19#07) द्वारा अपनी घादी को गहरा करती रई । उपर्यकत विवरण से यह स्पष्ट हो गया है कि नदियों वे विषय मे प्राघीन काल में ही पर्याप्त जानकारी प्राम हों गयी थी। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि प्राचीन काल के विचारको ने यद्यपि भूगोल खासकर भु-आइ्ति विज्ञान भम्बन्धी कुछ छिटपुट विचारों का प्रतिपादन तो किया परन्तु वे किम्ती भी सुनियोजिए तथा स्वस्थ विचारधारा का सम्पादन नही कर सत्ते * (0) भर्न्धयुघ--रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भू-आकृति विज्ञान के रगमच से उठी यवलिका पुन. गिर पडती है । समस्त दृश्य ओझल-सा होने लगता है। विज्ञान वे! क्षेत्र में अस्पष्ठता तथा अस्त-व्यस्त का साम्राज्य हो जाता है। यह क्रम कई शदियों तक चलता रहता है। प्रथम शती ई० से चौदहवी शती तक न केवल भू-आहृति विज्ञान में वरन्‌ भूगोल के क्षेत्र भ भी प्रगति के आगे पूर्ण विराम लग जाता है। इस दोर्वकाल को अन्धयुग कहा जाता है | क्योकि लगभग चौदह सौ वर्षो तक स्थिरता का घना कुहरा छाया रहता है। इसके बावजूद कही-कही पर छिटपुद विचारों का सम्पादन अवश्य हुआ । अरब में अवोसेना (#शंप८1४७-- 980 10 1037 & 7) ने पर्वतो से सम्बन्धित विचारों का प्रतिपादन दिया ॥ उत्पत्ति के आधार पर उसने पर्वतो को दो वर्गों ग्रे विभाजित किया । प्रथम वर्ग के अन्तर्गत वे पर्वत आते हैं जिनका आविर्भाव स्थलखण्ड में उत्थान के कारण होता है। द्वितीय নশীন নর্বলী না निर्माण बहते हुए.जल तथा पवन द्वारा कोमल शैत में अपरदन द्वारा घाटी के निर्माण से होता है । इस तरह अवीयेना वे िचासे मे “विरवात्सक আযান” (৫116600212৩ 5०) का सङेत मिलता है। उसने यह भी बत्तायो कि अपरदनात्मक कार्य लम्बे समय के दौरान सम्पादित्त होता है, परन्तु उमकी दर अत्यन्त मन्द होतो है। इम तरह




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