अपभ्रंश मुक्तक काव्य और उसका हिंदी पर प्रभाव | Apbhransha Muktak Kavya Aur Usaka Hindii Par Prrabhaav

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अपप्रश भाषा को केन्द्रीय स्थिति ७स्वीकार कर लिया गया । जसे नुत्य < नच्च नाच, श्रु < सुन, ज्ञा < जानना आदि । हिन्दी में भी ये धातुये उसी रूप में मान्य हुईं । हारनले ने हिन्दी धातुओं की जो सूची प्रस्तुत की है उसकी अपन्न श धातुओं में समुफ्स्थिति अपम्रंश मे आधुनिक आर्य भाषाओ की प्रवृत्ति को लक्षित करती है ।*(३) अपभ्र श॒ में भ्वादि गण अधिक प्रभावशाली है। कभी-कभी भविष्यत्‌ काल के रूपों को वर्तमान के अर्थ में निर्मित किया गया है। जैसे त्क्ष देवख-देख ।(ष) कृदन्त युक्त धातुओं की संख्या अपभ्रश और हिन्दी दोनो में अधिक है ।(५) अपभ्र श॒ से कुछ धातुये देशी आधार पर बनायी गयी है जिनका জী संस्कृत में नहीं मिलता है। जेसे छड्ट <छोड़, चड़ < चढ़, उक < ढक, चवक्‍ख <_ चख । हिन्दी में भी ये धातुये प्रयुक्त हुईं है ।(६) ध्वनि परिवर्तेन से अस्ति का असति, अछट, अहइ रूप बना । अहइई का प्रयोग वर्ण रत्नाकर' में मिलता है| अवधो सें है के लिए अहइ का ही प्रयोग होता है । अच्छि तथा आछे का प्रयोग, मध्यकालीन काल्य मे यव-तवं মিল जाता है--होसइ करत म अच्छि (हेस० ४।३४८) भलहि जो अद्ध पास (पश्चावत)(७) अपश्चश मेँ वर्तमान कालके रूप करद, करहि, करहु, ` कर, करहु आदि हैं। हिन्दी मे भी इनके प्रयोग ज्यों के त्यों हुए ই जेसे-~~बसों (बसउ) ब्रज गोकुल गनि कै ग्वारन ऊधो विरहौ प्रेम करे (करइ सरसागर) । सर्वताम : हिन्दी में प्रयुक्त होनेवाले अनेक सर्वनाम जपञ्न श के ही हैं । जैसे-- हुउँ--हुउं झिज्जउं तड़ केहि (हेस०) सदेसडञ सवित्थरड हङं कहु णहु अससःश्र (संदेस० ८०) हों रानी पदुमावत्ति सात सरग पर वास-पदुमावत हों इस बेची बोच हो (बिहारी सतसई) मदं टाला मड तुहू वारिया (हमर) तं व्य मुक्खछ खल पाद्‌ मड ¡ (सदेशराषक, १६१)१. बंगाल एशियाटिक सोसाइटी जर्नल, जिल्द ४८, खण्ड १ (१८८० ई०), प्‌० ३३-८१ ।




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