गध-पथ | Gadha Path

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Gadha Path by Sumitranandan panth

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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्ँ मद्य-पथ चपला की चम्चल-डोरियो मे पेंग भरते हुए नये बादलों के हिडोरे पर भूलती हुई इन्द-घनुषी सुकुमारियोँ करी की झमक छर घटा की घमक मे हिडोरे की रमक मिला रही हैं । वहाँ सौन्दर्य श्रपनी ही सुकुमारता में झन्तध्रान हो रहा समस्त नन्तभ-मण्डल उसके श्री-चरणों पर निछावर हो नखावलि बन गया ब्लड्डारो की भनक ने देह-वीणा से फूट कर रूप को स्वर दे टिया है । वहाँ फूलों मे कॉटे नदी फूल ही विरहद से सूख कर कॉटो में बदल गये हैं --वह कल्पना का झ्निर्वचनीय इन्द्रजाल है प्रेम के पलकों में सौन्दर्य का स्वान है मत्य के दुदय में स्वर्ग का विस्व है मनोवेगा की श्रराजकता है । सच हैं पल पल पर पलटन लगे जाके श्रट्ठ अचूप ऐसी उस ब्रज-बाला के स्वरूप को कौन वर्णन कर सकता है ? उस माधुर्य की मेनका की कल्पना का शज्चल-छोर उसके _ उपासकों के श्वासीच्छुवासों के चार-वायु में उमड़ा हुछा नीलाकाश की तरह कैल कर कभी श्राध्यात्मिकता के नीरव-पुलिनों को भी स्पशे कर श्ाता हे पर कामना के कोके शीघ्र ही सौ-सौ हाथों से उसे खींच लेते हैं। वह त्रज के दूध दह्दी श्र माखन से पूरण-पस्फूटित-यौवना श्रपनी बाद्य-रूप-राशि पर इतनी मुग्ध रहती है कि उसे श्रपने श्रस्तजंगत्‌ के सौंदय के उपभोग करने उसकी श्रोर दष्टिपात करने का श्वकाश हो नहीं मिलता निःमन्देह उसका सौन्दर्य अपूर्व है भाषातोत हैं --यदद उस युग का नन्दन-कानन है जहाँ सौन्दर्य की श्रप्तरा ब्यपनी ही छवि की प्रभा में स्वच्छन्दतापूर्वक विहार करती हैं । झब्र हम उस युग का केलास देखेंगे जहाँ सुन्दरता मूतिमती तपस्था बनी हुई कामना की झम्नि- परीक्षा में उत्तीर्ण हो प्रेम की लोकोउज्वल-कारिणी स्निग्थ चन्द्रिका में सयम की स्थिर दीप-शिखा-सी शुद्ध एव निष्कलुष छुशोमित हैं। बह उस युग का शत- शत ध्वनिपूर्ण-कल्लोला में विलोड़ित बाह्य स्वरूप है यह उसका गम्भीर निर्वाकू-झन्तस्तल जिस प्रकार उस युग के स्वणु-गभ से भौतिक सुख-शान्ति के स्थापक प्रसूत हुए उसी प्रकार मानसिक सुख्व-शान्ति के शासक भी जो प्रातःस्मरणीय पुरुष इतिहास के पृष्ठों पर रामालुज रामानन्द कर्बीर मददाप्रमु बल्लभायाय मानक इत्यादि नामों से स्व्ाड्रित हैं इतिहास के ही नहीं देश के इत्सष पर




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