राष्ट्र - भाषा -हिन्दी | Rashtra - Bhasha - Hindi

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Rashtra - Bhasha - Hindi by Premchand suman

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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्छ्ः दृष्टि काम किया हे । उदू के विरोध का तो मेरे सामने प्ररन हो ही नददीं सकता । मैं तो उदू वालों को भी उसी भाषा की ओर ८. खींचना चाहूँगा जिसे में रा्ट्र-भाषा कहूँ । भर उस खींचने की प्रतिन 7 क्रिया में स्वभावत उदू वालों का सत लेकर भाषा के स्वरूप-परि- वर्तन सें भी बहुत दूर तक कुछ निश्चित लिद्धानत के झाघार पर जाने को तैयार हूँ । किन्तु जब तक वह काम नहीं होता तब तक इसी से सन्तोष करता हूँ कि हिन्दी द्वारा राषट्र के बहुत बढ़े अंशों में एकता स्थापित दो । झापने जिस प्रकार से काम उठाया है वद्द ऊपर मेरे निवेदन किये हुए क्रस से बिलकुल अलग है । में उसका विरोध नहीं करता किन्तु उसे झपना काम नहीं बना सकता । झापने शुज्रात के लोगों के मन में दुविघा पेदा होने की बात लिखी है । यदि ऐसा है तो कृपया विचार करें कि इसका कारण क्या है। सुके तो यह दिखाई देता है कि शुजरात क्रे लोगों तथा अन्य प्रान्तों के लोगों के हृदयों में दोनों लिपियों के सीखने का सिद्धान्त घुस नहदीं रददा दे किन्तु आपका व्यक्तित्व इस प्रकार का है कि जब शाप कोई बात कहते हें तो स्वभावतः इच्छा होती है कि उसकी पूर्ति की जाय । मेरी भी ऐसी ही इच्छा होती है किन्तु बुद्धि झापके बताए सार्ग का निरीक्षण करती है और उसे स्वीकार नहीं करती । झापने पेरीन बदन के बारे में लिखा है। यह सच दे कि वह दोनों काम करना चाहती हैं । उसमें तो कोई बाघा नहीं है । राष्ट्र साषा-प्रचार-समिति और हिन्दुस्तानी-प्रचार-सभा के कार्यकर्ताओं में विरोध न हो श्रौर वे एक-दूसरे के कामों को उदारता से देखें--इसमें यद्द बात सहायक होगी कि हि० प्र० सभा और रा० प्र० समिति का काम अलग-अलग संस्थाओं द्वारा दो एक ही संस्था द्वारा न चर्दें। के सद्रु य दूसरे के सदस्य हों किन्तु एक ही पदाधिकारी दोनों के दो से व्यावद्दारिक कठिनाइयाँ और बुद्धि भेद दोगा।




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