वैदिकधर्म | Vaidikdharm

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Vaidikdharm by श्रीपाद दामोदर सातवळेकर - Shripad Damodar Satwalekar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आत्मोक्तिके सोपान दी नहीं वह लगाव सा ही रह जाता है और ऐसे रागसें मनुष्य विक्षिप्त और मृढसा रहता इभा अष्ट हो जाता हे । सस्ययुक्त प्रेम पावन हे और सत्य रहित राग तो विक्ृृत कामवासनाका ही रूप हे वह प्रेम रहता ही नहीं। सत्य परविश्नतम भाव हे जो मनुष्यकोी सुपथपर चलाता है। सत्यज्योति मनुष्यका जीवनपथ आलोकित रखती है । सत्य अति आवश्यक हे । सत्य बिना भनुष्यका विकास संभव ही नहीं। ऋतके आच- रणमें, नेतिकताके वातावरणमें ही सत्य दृढ होता हे। सस्यके अभावसें सनुष्य पग पग पर ठोकरें खाता है, विधाद और अवसादमें ही डूबा रहता हे । सत्यके क्षमावप्तें जीवन सीरस और दुःखमय हो जाता हे और मनुष्य भयभीत रहता है। सत्य अमर तत्त्व है सत्यमें ही जीवन है। ऋतसें जीवन ज्योतिका विकास है जीवनकी वृद्धि हे । भिस प्रमे कारण लौकिक व्यवहारम लोग फंसे हुए दिखाप्ेका बरताव कर रह ह ओर मनम दम, धोखा, कष्ट छल, द्वोद रखे हुए हैं, बह प्रेम ही नहीं वह तो केवल काम- डिप्सा हे कल॒ष वासना है, उससे प्रेम करना मनुष्यके विकारी मनका द्योतक हे । प्रायः मनुय क्षणिक सुखङ़ रिषए अपने जीवनका हास कर रं है भौर विनाशोन्भुख छसे वेगसे जा रहे हैं, वह विकृत काम हे उसके प्रलोभने न आना चादिये | प्रायः छोग केवल शरीरमग्र जीवनचर्या कर रहे हैं क्षौर अपनी प्राणसक्ति मनःशक्ति तथा चेतनाशक्ति खो रहे हैं उनकी अवस्था दयनीय है । कामका विद्युद रूप सत्‌ सेकल्प है । सत्‌ संकस्य आत्मा की प्रेरणा हे । सत्‌ सकस्प भगवान्‌ करते हँ ओर सष्टिको रचना आरंभ हो जाती हे दिकी रचनानें केसी सन्दरता है केसा उत्तम नियम हे | आत्म प्ररणासे क्रि हए सत्‌ कमम भी सोन्दथ होता हे । ऋत्‌ ओर स्य मे दोनों अदर नियम काम निरंतर कर रदे हैं, इन्दीके कारण जगतीमें सौन्दर्य है। परमसुंदर भगवानका सौन्दय भगवाव्की रचनामें दी रहा हे । मनुप्यके कायम भी कत, नैतिकता ओर सुनिय- सता दीखनी चाये, यही मनुष्यका सौन्दयै है । निम प्रकार कामका विश्युद्ध रूप संकल्प हे, उसी प्रकार अहँकारका विज्युद्ध रूप मनष्यकी क्षपती चेतना शक्ति है और मनध्यका अपने अमरत्वमें पूणे विश्वास हे। मनष्य विकारोंका कभी चिन्तन न करे, विकारोंके चिन्तनसे मन बिकारी हो जाता है। मलुध्यकों अपने हृदयके तथा मनके विकार दिव्यजनोंकी सदायतासे हटाने चाद्िये | अदकारका बिकृत रूप अभिमान है। मनुष्य अपने आत्मसस्मानकी रक्षा करे, अपनी सर्यादा बनाए रखे, अपनी प्रतिष्ठा न जाने दे, पर अपनी योग्यता (११७) अथना नस्नत्ता तकका अभिमान न करें, तो सत्यकी उ्योतिका उससे सतत प्रकाश रहता है और वह जीवन पथमें निरंतर भगवानका साथ क्षनुभव करता है। यही सत्यका साक्षा- त्कार हि) क्षभिमान जब मनुष्ये भा जाता टै तो वास्तवमें उसका पत्तन आरंभ हों जाता है । सत्यका दैन परम दशन है यह आत्मज्योतिमे मगवरानृकी परम ज्यातिका प्रकाशन है । सत्य अमर है । सत्य आन्मा भी है भौर परमात्मा मी इन दोनों का मेल योग है | सत्य ज्ञान दी परम क्तान है । सत्यका व्यवहार, खद्‌ व्यव्हार ही परम शुद्ध व्यवहार है इसे सत्य, स्याव, द्या ओर प्रेमका समन्य हे । सत्य जव म्यवहारमें आता है तभी सत्य भ्यातित होता टे, प्रदीक्ठ होता दै । सत्यका प्रकाश दी अन्तः प्रका हे। सत्य ओर प्रेम दोनो ज्योतिर्मय हैं दोनोंक समन्वयमें विचित्र वीर्य हे, बछ है, तेज ই» লীল है, वर्चस है। पुरषार्यी प्रयत्न ओट मनुष्य हीरे सत्य प्रकट होता है । आरुसी ओर प्रमादी मन्य तो मनभ्यतासे गिर जाता हे, उसमे अभिमान জা ह्येता हे पर उसमे मानव- ताका मान नहीं होता, बड हीन द्रौन रहताहे मौर उसे भगवानके निकट रहनेका ध्यानतक नहीं जाता । जिसको आत्मज्योतिसें, अपनी जीवनज्योतिर्में, भगवानकी ज्योतिका दिव्य प्रकाश हो रहा हे वह धन्य है, उसे भगवानने स्वीकार किया हे 1 वद मनुष्य आत्मवान्‌ है। उसकी जीवन- चर्या देखी जाय तो पता लग जाता है कि वह सत्वस्थ है । उसकी जीवनचर्या परम सुखमय हे दान्त है, बह पूर्ण सात्विक ह) वह रज्ञशुणी तमोगुण व्यवहार नदीं करता, अतः वह्‌ मोह, कोक, मथ भौर रोगसे बचा रद्दता है भीर पूर्णस्वस्थ रहता है। सत्यमें अदभुत शक्ति है सत्यका अनुष्ठान मनुष्य- को झ्ज्षेय बना देता है । सत्यको धारण करनेकी तथा सत्यकों निर्भय रहते हुए प्रकट करनेकी जिसमें क्षमता है वह मनुष्य दिव्य हो चुका है! वह देवपुरुष है वह अब दिव्यजन है ऐसा मनुष्य दी श्षार्य है उसमें अर्थ भगवानके दिव्यगुण विद्यमान हैं, ऐसा मनुष्य अवदय सुयश दाता है उसकी समाजमें कीर्ति होती है और उसका यश अमर रहता दै ¦ रेखा दिम्यजन सदा ऐश्वयंतरान रहता है वह दिव्य ऐश्वर्य, अपने सत्यस्वरूप परम चैतन्य रूप परम सुन्दर स्वरूप भगवानसे पाता है और भगवानके साथमें, सगंधान दी की देखंरेखमें वह दिव्य ऐश्वर्य भोगता है। वह स्वार्थी नहीं होता उसका ऐश्वर्य सबे- हितमें सवमज्गलमें ही व्यय होता है। सत्य, यश, शोभा भर ऐश्वर्य यही विकासका क्रम है । দ্ধ र भ




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