संगीतकार बीथोवेन की कहानी | SANGEETKAR BEETHOVEN KI KAHANI

SANGEETKAR BEETHOVEN KI KAHANI  by अपूर्व भाटिया -APOORVA BHATIA

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उन दिनों शासक किसी राजा या सम्राट जितने ज़रूरी व्यक्ति नहीं थे, पर फिर भी वह काफी महत्वपर्ण माने जाते थे। जब लडविग को पता चला की वह उनके सामने राजसभा में बजाने जाएगा तो उसकी ख़शी के ठिकाना नहीं था। माँ! मझे तो यकीन ही नहीं हो रहा! , लडविग ने कहा। मझे बड़ी घबराहट हो रही है। तम अच्छा ही बजाओगे, माँ ने समझाया। मैं तम्हें जानती हूँ। तुमसे कोई गलती नहीं होगी। लडविग के पिता भी इस बात से बहत खश हए। उन्हें लगा की आखिरकार अब लुडविग एक जाना-मांना कल्लाकौर बन जाएगा और खब पैसे कमायेगा। इसलिए उन्होनें लडविग को एक शानदार रेशम की पोशाक पहनवाकर उसे राजसभा भेजा। लडविग पहले बहत ही चकित हुआ। उसके ऊपर जगमगाते हए झमर थे और चारों ओर दर्पणों की चमक! उसने सन्दर-सन्दर केपड़ों में बड़े-बड़े मशहूर लोगों को आते हए देखा और उसके ठीक सामने राजसभा के बीचों-बीच उसके शहर के मख्य-शासक अपनी गद्दी पर बैठे थे। अरे बटन! , वह फसफसाया। मेरे तो पैर कांप रहे हैं! मझे नहीं लगता कि मेँ कीबोर्ड तक भी पहुँच पाऊँगा। अरे ऐसा क्‍यों कह रहे हो,“ बटन बोला। तम सिर्फ संगीत के बारे में सोचो। संगीत के बारे में सोचने पर तम से कभी कोई गलती नहीं होगी।




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