क्षणों की अथाह नीलिमा | KSHANON KI ATHAH NEELIMA

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धर्मवीर भारती - Dharmvir Bharati

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पुस्तक समूह - Pustak Samuh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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86/23/2016 मैंने कभी मृत्यु के बारे में नहीं सोचा, पर कभी-कभी यह जरुर सोचता हूँ कि जिये जाने वाले क्षणों की यह जो अंतर्गथित श्रृंखला है इसका कहीं न कहीं तो अंत होगा ही। औ जब होगा तब कुछ खास नहीं होगा... मैं तो, स्वर्ण पराग सा उसी तरह महकता रहूँगा, सिर्फ नीले क्षण पाँखुरियों की तरह ऊपर से घिरने लगेंगे, सिमटने लगेंगे और धीरे-धीरे फूल मुँद जाएगा। और फिर सब शांत हो जाएगा। सिर्फ डूबती साँझ में मुँदे कमल की हलकी उदास छाँह थोड़ी देर तक सरोवर में कॉपती रहेगी, कॉपती रहेगी... और बस। शीर्ष पर जाएँ 44




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