समुद्र तट पर | SAMUDRA TAT PAR

SAMUDRA TAT PAR by ओ० वी० विजयन - O. B. VIJAYANपुस्तक समूह - Pustak Samuh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहरेदार की नज़र, उस कागज पर लिखे शब्दों से चिपक गई | उसका कठोर चेहरा, नरम पड़ गया । “कल, न ?” उसने सांत्वना देते हुए पूछा । “मालूम नहीं । इसी में लिखा है, सब कुछ ।” पहरेदार ने एक बार फिर, उस ऑर्डर को पढ़ा। “हॉ,” उसने कहा, “कल सुबह पाँच बजे ।” वेलायी-अप्पन हैरान रह गये, “अच्छा ?” “बाबा, थोड़ी देर बैठ कर सुस्ता लो ।”




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