आधे अधूरे | AADHE ADHURE

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मोहन राकेश - Mohan Rakesh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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32 आधे अधूरे दरवाज़ों में ? छत में ? दीवारों में ? तुम में ? डेडी में ? किन्‍नी में ? अशोक में ? कहाँ छिपी है वह मनहूस चीज़ जो वह कहता है मैं इस घर से अपने अन्दर लेकर गयी हैँ ? (स्त्री को दोनों बाहें हाँथों में लेकर) बताओ ममा, क्या है वह चीज़ ? कहाँ पर है वह इस घर में ? काफ़ी लम्बा वक़फ़ा। कुछ देर बड़ी लड़की के हाथ स्त्री की बाँहों पर रुके रहते हैं और दोनों की आँखें मिली रहतो हैं । धीरे-धीरे पुरुष एक की गरदन उनकी तरफ़ मुड़ती है । तभी स्त्री आहिस्ता से बड़ी लड़की के हाथ अपनी बाँहों से हटा देती है। उसकी आँखें पुरुष एक से मिलती हैं और वह जैसे उससे कुछ क हने के लिए कुछ क़दम उसकी तरफ़ बढ़ाती है । बड़ी लड़की जेसे अब भी अपने सवाल का जवाब चाहती, अपनी जगह पर रुकी उन दोनों को देखती रहती है । पुरुष एक स्त्री को अपनी तरफ़ आते देख आँखें उधर से हटा लेता है और दो-एक पल असमंजस में रहने के बाद अनजाने में ही अख़बार को गोल करके दोनों हाथों से उसकी रस्सी बठने लगता है। स्त्री आधे रास्ते में ही कुछ कहने का विचार छोड़कर पल-भर अपने को सहेजती है। फिर बड़ी . लड़की के पास वापस जाकर हलके-से उसके ... कंधे को छूती है। बड़ी लड़की पल-भर आँखें . मदे रहकर अपने आवेग को दबाने का प्रयत्न करती है, फिर स्त्री का हाथ कंधे से हटाकर एक कुरसी का सहारा लिये उस पर बंठ जाती है। स्त्री, यह समरू में न आने से कि अब उसे क्या करना चाहिए, पल-भर दुविधा में हाथ उलभाये रहती है। उसकी आँखें फिर एक बार पुरुष एक से मिल जातो हैं और वह जंसे आँखों से ही उसका तिरस्कार करके अपने को एक मोढ़े की स्थिति बदलने आधे अधूरे छोटी लड़की : स्त्री स्त्री: छोटी लड़की : स्त्री : छोटी लड़की : स्त्री पुरुष एक : . 33 में व्यस्त कर लेती है । पुरुष एक अपनी जगह से उठ पड़ता है। अख़बार की रस्सी अपने हाथों में देखकर कुछ अटपटा महसूस करता है ओर कुछ देर अनिश्चित खड़ा रहने के बाद फिर से “बंठकर उस रस्सी के टुकड़े करने लगता है । तभो छोटी लड़की. बाहर के दरवाज़े से आती है और उन तीनों को उस तरह देखकर अचानक ठिठक जाती है। कुछ पता नहीं चलता यहाँ तो । तीनों में से केवल स्त्री उसकी तरफ़ दख लेती है। : क्‍या कह रही है तू ? छोटी लड़की : बताओ, चलता है कुछ पता ? स्कूल से. आयी, तो घर पर कोई भी नहीं था। और अब आयी हूँ, तो तुम भी हो डडी भी हैं, बिन्‍नी-दी भी हैं---पर सब लोग ऐसे चप हैं जसे' (उसकी तरफ़ आती ) तू अपना बता कि आते ही चली कहाँ गयी थी ? कहीं भी चली गयी थी । घर पर था कोई जिसके पास बैठती यहाँ ? ...दूध गरम हुआ है मेरा ? अभी हुआ जाता है । अभी हुआ जाता है | स्कूल में भूख लगे तो कोई पैसा नहीं होता पास में । और घर पंर आने पर घंटा-घंटा दूध ही नहीं होता गरम । : कहा है न तुभते, अभी हुआ जाता है। (पुरुष एक से ) तुम उठ रहे हो या मैं जाऊँ ? द पुरुष एक अख़बार के टुकड़ों को दोनों हाथों में समेटे उठ खड़ा होता है । (कोई कड़वो चोज़् निगलने की तरह) जा रहा हूँ मैं ही...। अखबार के टुकड़ों पर इस तरह नज़र डाल लेता है जंसे कि वह कोई बहुत ही महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ था जिसे उसने दुकड़े-टुकड़े कर दिया है।




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