महोदय पंडित | MAHOSHADH PANDIT

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भदंत आनंद कौसल्यायन -Bhadant Aanand Kausalyayan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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14 महोषध पण्डित को प्रकट करू ! उसने आदमी का रूप बनाया और रथ का पिछला हिस्सा पकड़ दौड़ने लगा। रथ में बठे आदमी ने पूछा, “तात ! क्यों आया है ? “तुम्हारी सेवा करने के लिए ।” उसने अच्छा' कह स्वीकार किया। जब वह रथ से उतर शारीरिक- कृत्य करने गया, शक्त ने रथ में बेठ ज़ोर से रथ हाँक दिया। रथ के मालिक ने उसे रथ लिए जाते देखा तो टठोका, “रुक-रुक ! मेरा रथ कहाँ लिए जाता है ? ” “तेरा रथ दूसरा होगा। यह तो मेरा रथ है।” दोनों झगड़ते हुए शाला-द्वार पर झा पहुँचे । महोषध पण्डित ने भगड़े का कारण जान दोनों से प्रइन किया, मेरे निर्णय को स्वीकार करोगे ?” “हाँ ! स्वीकार करेंगे।” “मैं रथ को हाँकता हूं। तुम दोनों रथ को पीछे से पकड़कर हा । जो रथ का स्वामों होगा, वह रथ नहीं छोड़ेगा; दूसरा छोड़ गा।' यह कहकर उसने अपने आदमी को भ्राज्ञा दी कि रथ हाँके । उसने वेंसा ही किया। दोनों जने पीछे से रथ को पकड़े चले । रथ का मालिक थोड़ो दूर जाकर, रथ के साथ दौड़ न सकने के कारण, रथ को छोड़ खड़ा हो गया। शक्र रथ के साथ दौड़ता ही चला गया । महोषघ्॒ पण्डित ने रथ रुकवा आदमियों को कहा, “एक आदमी थोड़ी ही दूर जा रथ को छोड़ खड़ा हो गया | यह रथ के साथ-साथ दोड़ता हुआ रथ के साथ ही रुका । इसके दरीर में पसीके की बूँद भो नहीं है । न साँस ही चढ़ी है। यह निर्भय है। इस की पलके भो नहीं हैं । यह देवेन्द्र श्र है ।” तब उसने प्रदन किया, “क्या तू देवराज इन्द्र है ?” हा हर “किसलिए आया ? ”




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