मेरे यादो अंकल | MERE YADO UNCLE

MERE YADO UNCLE by अरविन्द गुप्ता - Arvind Guptaमुहम्मद उमर -MUHAMMAD UMAR

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मुहम्मद उमर -MUHAMMAD UMAR

2010 से राजस्थान के अजीम प्रेमजी फाउंडेशन में गणित के लिए एक संसाधन व्यक्ति के रूप में कार्यरत

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एसआईईआरटी उदयपुर, राजस्थान (आईजीआईजी राजस्थान) में शिक्षाशास्त्र और पाठ्यक्रम विशेषज्ञ
एकलव्य में अनुसंधान सहयोगी गणित - शैक्षिक अनुसंधान और नवाचार संस्थान, होशंगाबाद, मध्य प्रदेश।
जागृति बाल विकास समिति, कानपुर, उत्तर प्रदेश में गणित और विज्ञान शिक्षक।
आईआईटी कानपुर में सामाजिक परिवर्तन के लिए एक थिएटर ग्रुप, जन चेतना मंच के संस्थापक सदस्य
...के रूप में भी काम किया |

संपर्क नंबर: 9001565000

ई-मेल आईडी: [email protected]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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यादो अंकल स्वभाव से संवेदनशील आदमी थे। मेरी दादी के इंतकाल के समय सब कामों में आगे रहकर उन्होने एक अच्छे पडोसी की जिम्मेदारी निभाई थी। कब्र खोदे जाने से लेकर कफन-दफन तक, सबमे साथ रहे थे। वहाँ कब्रस्तान के पास की नहर के पानी से एक खेत सींचा जा रहा था। उस बहती हुई नाली में यादो अंकल ने अपने हाथ पैर धोयें और सिर पर रूमाल रखे हम सब के पास आकर बोलें वो पानी पाक है सब लोग जाकर वुजु बना लो। जनाजे की नमाज के वक्‍त मैने देखा कि उन्होने भी अपने सर पर रूमाल रखकर ठीक वैसा ही अहतराम किया जैसा बाकी मुसलमान कर रहे थे। उस दिन मुझे समझ आया कि यादो अंकल सिर्फ अपने धरम के बारे में ही नही बल्कि दूसरे धरम के रिवाजों को भी खूब अच्छे से समझते हैं। उनके मन में सभी धरमों के लिए खूब सम्मान था। आज मै जब कभी किसी चर्चा में या टी.वी. की बहसों में सैक्यूलर या समाप्रदायिक सौहार्द जैसा शब्द सुनता हूँ तो यादो अंकल का चेहरा सामने घूम जाता है। यह भी सोचता हूँ कि मैं आज जैसा हूँ. जिन विचारों को मानता हूँ उसमें यादो अंकल जैसे लोगों के सानिध्य ने भी अवश्य ही प्रभाव डाला होगा । एक समय ऐसा भी आया था जब उत्तर प्रदेश के हिन्दु मुसलमान के दिलों में एक दूसरे के लिए खूब नफरत भर दी गई थी। कानपुर में जबरदस्त दंगों का दौर जारी था। आई.आई.टी. कानपुर जैसे संस्थान के भीतर भी कुछ संगठनों द्वारा आए दिन जुलूस निकालना और शोर -शराबा करना होता रहता था। पूरे कैंपस में चार-छह घर ही मुसलमान थे।| सब डरे सहमे रहते थे। सक्सर घर पर अम्मा अब्बा में बातचीत होती थी की अगर रात बिरात कहीं छिपना पडे तो किसके घर पनाह मागना ठीक होगा। उस वक्‍त एक ही घर सूझता था - यादो अंकल का घर। सच में,यूँ तो सारा मोहल्ला ही अपना था पर ऐसे वक्‍त में सबसे ज्यादा ऐतबार यादो अंकल के घर पर ही बन पाता था। सबके साथ हँसने हँसाने वाले यादों अंकल अब समय बीतने के साथ ही काफी परेशान और बीमार से नजर आने लगे थे। डाक्टरों ने बताया था कि उनको दमा की बीमारी है, लंबा इलाज करना पडेगा। इधर घर पर होने वाली बातों से पता चला कि कई साल पहले यादो अंकल का तबादला एक विभाग से दूसरे किसी विभाग में किया जा रहा था। वे नही माने, दूसरे विभाग में जाने से इन्कार कर दिया। उधर प्रशासन भी अपनी जिद पर अडा रहा। मामला इतना बिगडा कि कोर्ट कचहरी तक जा पहुँचा। कोर्ट कचहरी के फैसले इतनी जल्दी कहा सुलझते हैं। मामला बहुत लंबा खिच गया। इस दौरान यादो अंकल सस्पेंड कर दिए गये। पिछले कई बरस से उन्हें अपने मूल वेतन का कुछ ही हिस्सा मिल रहा था। इसी में वे अपने दमे का इलाज, पत्नी के ब्लड प्रेशर और तीन बेटियों की पढाई का खर्च किसी तरह से पूरा करते आ रहे थे। स्वाभिमानी इतने थे कि अपनी परेशानियों को कभी लोगों के सामने जाहिर भी नही करते। बच्चों से तो हमेशा ही उनको प्यार रहा। पुराने पडोसियों के नाती-पोते और नए पडोसियों के बच्चे तो उनकी गोद में ही खेलकर बडे हुए हैं। अपने माँ बाप से ज्यादा यादो अंकल और यादो आंटी को ही पहचानते हैं। समय बीतता गया। काम काज के चलते मेरा कानपुर छूट गया। साल छह महीने मे जाना आना होता तो सबसे मुलाकात हो जाया करती थी। यादो जी से भी दुआ सलाम हो जाती थी। बातचीत में पता चलता था कि उनका कोर्ट केस और भी जटिल रूप लेता जा रहा है। प्रशासन तरह तरह से उनको परेशान करने लगा था। इस सिलसिले में उन्हे हाईकोर्ट के कई चक्कर लगाने पडते थें। गॉव के खेत से मिला कुछ राशन जरूर आ जाया करता था लेकिन दूसरे खर्च पूरा करने के लिए यादो जी ने बच्चों को ट्यूशन पढाना शुरू कर दिया था। कोर्ट कचहरी और अपनी बीमारी से जूझते हुए भी यादो जी ने अपनी बेटियों को अपने पैरों पर खडा किया | तीनो अच्छा पढ लिख गई और घर को आर्थिक सहयोग देने लगी हैं। बडी की शादी हो चुकी है। मंझली ने बचपन से ही अपने पिताजी को अदालतों में दौडते देखा है| इसलिए वह वकालत की पढाई पूरी कर स्थानीय कोर्ट में प्रैक्टिस कर रही है। उसे उम्मीद थी की पिताजी के केस में वह मदद कर सकेगी | छोटी वाली पास के निजी स्कूल में बतौर शिक्षिका पढाने लगी थी।




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