आकाश दर्शन | AKASH DARSHAN
श्रेणी : बाल पुस्तकें / Children

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
12 MB
कुल पष्ठ :
189
श्रेणी :
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गुणाकर मुले - Gunakar Mule
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)मारतीय रधिषक्र : यह पित्र भ्री नमाला” के विवरण के आधार पर
बना है; इसमें बाहरी बेरे में आरभ्-राधि गेष है और अंतिम राशि मीन:
कीच के पेरे में रहु-केठु सहित 9 बह हैं कद में चारों विज्ञाओं के साथ
द छुमेठ पर्वत को (दिखाया गर्म है.
आधुनिक भारतीय पंचांगों में, और फलित-ज्योतिष में भी, आज सात वारों और
बारह णशियों की धारणाओं का बड़ा महत्व है, मगर वास्तविकता यह है कि
वैदिक साहित्य, वेदांग-ज्योतिष और महाभारत में स्रात वारों तथा बारह राशियों
का कहीं कोई उल्लेख नहीं है | भारतीय ज्योतिष्ंष में सात वारों और बारह
30 / जाकाश दर्शन
णशियों का समावेश बाद में, ईसवी सन् की आरंभिक सदियों में हुआ । इसकी
अधिक चर्चा हम आगे करेंगे |
. फिलहाल महत्व का प्रश्न है--चंद्रमार्ग को 27 या 28 भागों (नक्षत्रों) में
बांटने की पद्धति सर्वप्रथम किस देश में शुरू हुई ? द
पिछले करीब दो सौ वर्षों से अनेक विद्वान इस समस्या के बारे में अपने मत
प्रस्तुत करते आ रहे हैं | वजह यह है कि 28 चांद्र-नक्षत्रों का प्रचलन चीनी और
अरी ज्योतिष में भी देखने को मिलता है । कुछ भिन्न रूप में नक्षत्र-विभाजन
की यह पद्धति प्राचीन मेसोपोटामिया, मिश्र और ईयन में भी देखने को मिलती
है । इसलिए कुछ विद्वानों का मत है कि चीन की चांद्र-नक्षत्र पद्धति अधिक
प्राचीन है, तो कुछ विद्वानों का विचार है कि चांद्र-नक्षत्र पद्धति का मूल
बेबीलोनी ज्योतिष में है | द
चीनी और अरबी ज्योतिष में 28 नक्षत्रों का प्रचलन रहा है | अखी ज्योतिष
चीनी तायकेन (247 ई). इसमें 1034 वार्यों क्री सही स्थितियों के
अलावा आकाश्षयगा की सीमाएं भी स्पष्ट की गई हैं:
नक्षत्र स्वदेशी : राशियां विदेशी / 31
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