मध्ययुगीन हिंदी कृष्ण - भक्तिधारा और चैतन्य - सम्प्रदाय | Madhyayugeen Hindi Krishna-bhaktidhara Aur Chaitanya-sampraday

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अध्याय है पृ० ७१-११० भक्ति भक्ति का दार्शनिक आधार ७१ भक्ति का मनोविज्ञान ७३ प्रेमा- भक्ति का स्वरूप ७६ भक्ति के भेद - साधन भक्ति ८२ वधी ८२ रागनुगा ८९ कामरूपा ८३े सम्बन्ध रूपा ८४ कामानुगा ८६ भावभक्ति ८६ प्रेमभक्ति ९१ पुष्टि भक्ति--प्रवाह-पुष्टि ९२ मर्यादा-पुष्टि € ३ पुष्टि-पुष्टि €३ शुद्धि-पुष्टि € ३ भक्ति-साधना के अनिवायं अंग--भगवत्कृपा किवा अनुप्रह ९४ गुरु-आश्रय ६७ आत्म-सम्पंण १०१ नाम १०६ सत्संग १०९३ अध्याय ४... पु० ११३-१७९ ... . भक्ति साधना एवं विकास-क्रम नवधा-भर्वित--श्रवण ११५ कीतेन ११७ स्मरण ११ €£ पाद- सेवन १२० अचंच १९२१ वन्दन ८२२ दास्य १२२ सख्य १२३ ७ आत्म-निवेदन १२४ सेवा--राधावल्लभी सम्प्रदाय में अष्टयाम सेवा १२८ निम्बाकं-सम्प्रदाय १३१ गोड़ीय सम्प्रदाय १३६ वत्लभ- सम्प्रदाय १४५ अनुरागसूलक साधना १५० चैतन्य-सम्प्रदाय में मधुर भक्ति--पूव॑राग १५२ अभिसार १५५ सान १५६ माथुर १४५८ पुर्मिलन १४५८ वल्लभ-सम्प्रदाय में गोपी भाव १४८--माखच-चोरी १६० चीरहरण १६१ पनघट-लीला १६४ दानलीला १६५ रासलीला १६७ हिंडोल फाग १६८ निकृंज- लीला सखी भाव १६८ । रस [खण्ड प्रथम] रस के आधार १७३ भक्ति-रस का स्वरूप १७४ काव्य-रस एवं भक्तिःरस १७७. भक्ति-रस की स्थापना १८०--स्थायीभावत्व १८३ योग्यता-त्रय . १८३ कृष्णभक्ति-रस १८४ स्थायीभाव रै८५--शुद्धारति १८६ प्रीति-रति १५६ सख्य रति १८७ वात्सल्यरति १८७ प्रियतारति १८७) विभाव १८७--छालम्बनः




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