भर्तृहरिकृतम् | Bhartrihari kratam

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Bhartrihari kratam by खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नीतिशतकम । - १४ केशादि पुरुपॉकों भूपित नहीं करसकते केवल वह वाणी जो संस्का- रयुक्त धारणकी गई हो सो पुरुपको शूपित करसकती है और सब भूषण अवश्य क्षय होजाते हैं परन्तु केवल चाणीददीका भूषण भूषणुकी ठौर रहजाते हैं ॥ १९ ॥ विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रस्‍्छन्नगुप्त॑ धनम्‌ विद्या भोगकरी यशसुखकरी विद्या गुरूणां गुरु ॥ विद्या बंधुजनों विदेशागमने विद्या परं दैवतम्‌ विद्या राजसुप्ूजिता नहि धन विद्याविह्ीनः पशुशा२०॥ ( सं+ टी० ) विद्येति ! पुरुपस्प विद्याव्यतिरिक्त॑ यद्धनं तद्धनें न भव- ति तस्तीयतें तस्करादिभिनीयते गोप्य॑ न भवति अतो विद्या नाम धर्न त- त्समीचीनं वहुगुणम्‌। कथंभूत॑ विद्यारूर्य धनम्‌ नरस्याधिकं रूप॑ करोति तथा च पम्रच्छन्न॑ युप्तं धन भवति विद्याभोगकरी भोगान्करोति यश कीर्ति सुखे च करोति । विद्या गुरूणां गुरु। क्द्रगुरव+ सवविद्यासंपूर्ण प्राज्ं अष्टुमायाति स माक्ष गुरूणामपि गुरुः । अय च ग़णाति हितमुपदिशातीति शुरुरिति युरु- पदव्याखूयानमतों हितकर्नी विदेव विदेदागमने विद्या बंधुजनः विदेदी. थे जनास्ते विद्या बंधुजना एव भवंति विद्या पर॑ देवत॑ राजसुपूजिता » विद्या येपां ते राज्ञां सभायां पूजिता भवंति । तथा धनाठ्या। पूजिता न भवंति अतो विद्याविद्दीनो यः स पझुरेव बोद्धव्य+ ॥ २० ॥ ( भा० टी० ) विव्यारुपी वस्तु मनुष्यका अधिकरूप और न के 3 कि + स छिपाहुआ अंतरधन है और विद्याही भोग यश और सुखकी के हक- ७५० #५, गुरुहे क श ९ संपादन करनेवाठी और गुरूओंकी गुरुहै परदेशमें विद्याही नंघुजन 3 #७, व ५५. है और विद्याही परमदेवता है और विद्याहदी . राजाहोगोंमें पूज्य च्झ७ ७ # कि न ५ , है कुछ धन नहीं पूजित है इसलिये विव्याविहीन नर पशु हैं॥२०॥ का




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