श्री मुहम्मदबोध और काफिरबोध | Shri Mohammad Bodh Aur Kafirbodh

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Shri Mohammad Bodh Aur Kafirbodh by खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बोधसागर । (१३३ माॉकाम ३३ ढ ते आगे लायो डोरी । सुमेरते सुन्य अठारह कोरी । येतो अघर सुन्य अस्थाना । जबरुत मोकाम इंसाको इसा पेगम्बर पढ़े किताबा । इसका नाम इंजील किताबा सलामालेक तहँँ दम कीना । दस्ता बोस उनइ उठि लीन तहूँवा बेठि विस्वभर राई। वही पीर तो वहीं. खुदाई इद्दँते अपर सृन्य है भाई । ताकी शोभा कही. न जाई माॉकामस | ४ दाझन्यकों लागी डोरी । ग्यारह पालँग तहाँ ते सोरी। लाहुत मॉकाम कहावे सोइ । जो. देखे बहुते सुख होई। झस्तफा पेगंबर बैठे तहेँ । फुरकान किताब पढतथे जहीँ । . सलामालेक तहाँ दम कीना । दस्ताबोस इउनईइ उठि लीना ॥ देखतही मुद्दम्मद अस्थाना । तुम बेचन कहो यहीं ठेकाना । वारो फिरिश्ते सलामालेक कीना । तब इम आगेका पग दीन माकाम्। ५. . तहूँते चठे अचित ढेकाना । एक असंख्य सुन्य परमाना ॥ दाहूत मोकामको वद्दी ठेकाना । आगे दे सोह बंधाना ॥ माकाम। है तीन असख्य झुन्य परमानी। बाहुत मोकाम सो कहो बखानी॥ नवी कवीर चले तेहि आगे | मूल. सुरति बैठे. अनुरागे॥ नाकान | ७ बाँच असख सुब्न बिच आहदी। सात मोकाम कहत हे. ताही झाकाम ।<८ छा!सुरतिके पहुँच द्वीप । चार असंख दे लोक समीप 'ताको नाम राहृत मोकामा । नबी कबीर पैंहुचे तेहि ठाम




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