मथुरा कला | Mathura Kala

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Mathura Kala by श्री बासुदेवशरण अग्रवाल - Shree Basudevsharan Agrawal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दोतता है कि इतने विभिन्न तत्त्व एकसाथ मिठकर यहाँ रद्द सके और एक समन्वयप्रवान सस्कतिका निर्मोण करनेमे सम हुए। पारम्परिक सद्धाय की नीय पर विकसित उस समन्वयात्मेक सस्कृतिने शुप्तकाठमे समस्त देशमे फैठकर राष्ट्रीय सस्कृतिका रूप धारण कर छिया। आजतक वही सहिप्णुत्ताप्रधान विचारधारा भारतरर्पफी मूछ सस्कृततिके रूपमें देशमे च्याप्त है। मध्यंदेशकी यह सज्ञानाव्मर सरकति ही हमारी राष्ट्रीय सस्कति है। भेदोंकी मिठाकर एक करनेकी इससे अदूभुत विशेषता है। भारतवर्पक्ते धार्मिक सास्कृतिक और दिर्प-स्थापत्य सम्बन्थी इतिहासमे मथुराका जो महत्त्वपूर्ण स्थान है उसका समसे उत्कृष्ट प्रमाण यहाँसे प्राप्त शिरुपफो सामप्रीमें मिठता है। अतण्य मधुराकी शिल्पक्रछाका विशेष अध्ययन आवदयक है जिससे दम अपने प्राचीन सास्कृतिक विकासकों समझनेमें सहायता प्राप्त कर सके संधिस ऐतिदासिक परिचय पुरार्णोकी अनुशुतिसे मथुराके सम्बन्धमें ज्ञात होता है कि मु नामके असुरने एक पुरीकी स्थापना की थी जो उसके नामसे मधुपुरी फद्दछाई। उसका पुत्र लयणासुर हुआ। मघुके नामसे जमी सफ मयुरासे लगभग चार मील हटकर महोली नामका गाँप वसा हुआ हे और उसके पास उपणासुरसे सम्पस्धित नोनासुस्बा टीला भी बताया जाता है। लपणासुरकों परास्त करके श्रुन्नते बतेमान सयुरापुरीकी स्थापना की। सम्भय हे कि इस अनुश्रुतिके पीठे कोई भारीतिद्वासिक सत्य छिपा हो। उन्चारणसेद्से मधुर हीं मथुरा कहदलाई। जैन और बौद्ध ग्न्योमे इसका नाम मधघुरा या मरा मी पाया जाता हैं। मयुराके इतिद्दासकी दूसरी यडी घटना मगयान्‌ कृप्णका जन्म है जिसके कारण यदद पुरी इमेशाके ठिये अमर हो गई। मददमारतके बाद मद्दाजनपदोंके युग मधुराफे इनिद्दास पर प्रकाशकी किरण अधिक रपप्ट हो जाती हैं। छठी शी ई पूर्व पड




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