प्रसाद की कला | Prasad Ki Kala

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रसादूजी की कविता का क्षेत्र ११ उसे यह सोचने का समय भी नहीं मिलता कि झृदय किसको देना है | उस समय तो-- प्रथम यौवन मदिरा से मत्त, प्रेम करने की थी परवाह श्र किसको देना है हृदय, चीह्नने की थी तनिक न चाह ! सु्गसिनी के शब्दों में श्रकस्मात जीवन-कानन में एक राका रजनी की छाया में छिपकर मधुर बसन्त घुस श्राता है । शरीर की सब क्या रियाँ हरो-मरी हो जाती हैं । सौन्दर्य का कोकिल “कौन कहकर उसको रोकने- टोकने लगता है; पुकारने लगता है। >६ >६ >६ फिर उसी में प्रेम का पुकुल लग जाता है, श्र/स. भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रदती है । देखकर जिसे एक ही बार, हो गए हैं हम भी श्चुरक्त देख लो तुम भी यदि निज रूप; तुम्हीं हो जाद्योगे झासक्त ! यह प्रेम-रूप श्रासक्ति है--श्राँख का खेल है। इद्ध जन इसे डुछ मी कहें परन्तु घुवक जीवन में इसका एक विशेष महत्व दा यह रूप-झाकषण विश्व भर में-- समस्त जड़-चेतन में व्याप्त दे । प्रसादजी कहते हैं कि संसार में यही एक मात्र परिचय का कारण है / उषा का प्राची में आभास सरोरुदद का सर बीच विकास कौन परिचय था स्या सम्बन्ध गगन-मंडल में अरुण-विलास ! देखिए, इमारे आदि पुरुष मनु की श्रद्धा का रूप सौन्दर्य पान कर स्या दशा हुई थी । श्रद्धा की रूप-ज्वाला कैसी थी-- नील परिधान बीच सुकुमार खुल रददा सदुल श्रघखुला अन्न खिला हो ज्यों बिजली का फूल सेघ बन बीच गुलाबी रंग ।




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