कृष्ण वाक्य | Krishn Vakya

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
54
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)[ कै.>अहिंसी सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रिय निम्नह। ।
<हिंत 'खामासिक धर्म चातुर्व्ष्य5प्रचीन्मनुः ॥ ४ ॥
ही यमया मठु० आप १०॥ ६३ ॥सत्यमस्तेषयमक्रोघो हीः शौच धीधतिदेभः ।
संयतेन्द्रियता विद्या घर्मः से उदाह्ृतः॥ ५ ॥इन सब गछोका में “शोच'” शप्द ) याज्नवल्क्य अ० १। ११२
आया है|इसी प्रकार दक्ष नी महारान कहते हैं फ्ि वुद्धिमानों ने कहा है फि शौच को
करना और अश्ञोच को त्यागना चाहिये। यथा---
उक्त शौचमशाच च काय्प त्याज्य सनीषिभि। ॥ ६ ॥
दक्ष अ० ५ 1 २
और शौच ( पवित्रता ) में सदेव यत्त करना चाहिये क्योंकि द्विमपने का
कारण शौच ( शुद्धता ) ही कहा है। शोच ( निर्मेठता ) के आचरण से नो शान
है उस के सव कमे निप्फछ हैं। यथा---
आधे थज्नः सदा कार्य्चः शौच सूलो विज: सखला ।
शौनाचारविहीनस्थ समता निष्कला३ क्रिया; ॥७॥
न दूच अ० ५1२
दक्ष जी महाराज कहते हैं कि शौच दो प्रकार का है एक बाहर फा औरदूसरा! भीतर का, बाहरी मशी और गछ से और भीतरी (अन्त: शोच मन की शुद्धि
से होता है। यथा-+-' - शौच च दिकिध प्रोत्त पाश्माच्यम्तरं तथा 1
सुज्जलास्यां स्प्॒त बाहं भाव शुद्धि रथांतरे ॥ष्ण
दक्ष अ० ५। ह> कस ी् ४ के
५... ईंसी प्रकार एक ओर महात्मा ने कहा है कि पवित्रता दो प्रकार की होती
९1( ३ ) वाह अथीद शरीर को शुद्ध रखना। खच्छ जह से स्नान करना।
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