तीर्थ दर्शन पाण्डअर्पण | Tirth Darshan Panda Arpan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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{ १५ ) तीर्थो में मनुष्ध चहुचा ঘালাগ আহি धातुओं की प्रतिमाओं को इंड्वर की मूर्ति समझ कर पूजा करते हैं पर वह भोले भाछे यह नहीं जानते | क्रि-इशर निराकार है-देखिये! यज्ुर्वेद अ० ३२ । ३ में छिखा है कि परमेदर की, जिसका अश्वण्ड यड ओर प्रताप है, मूरति नहीं हती यथा-न तस्य मरत्तिया जास्ति यस्य नाम महयश्चः।। पुराणौ मे मी ई्वर के! निसकार कहा मया है } यथा-- हस्त पादादि रहितं निशेणं भरते: परम्‌ = वृहवेवकतपुराण ॥ नि्िका रो निराकारे निरवचखोहमव्ययः = तत्ववेध ॥ निशतःसचचिदानन्दः=गरुदपुराख । निराकार निरन्तरम्‌ अवघ्रूतगीता ! निविकारं निरज्जनम्‌ =जा० रामायण ॥ अनन्य भक्त जी ने इवर को निराकार माना है | यथा-- सवै परै अरू सप त्रै एनि स्वं विषै परिपृर रहो है । बार न पारअपारअखण्डसो पिण्डब्रह्माण्डसमावलहों है 0 : पूरन सर्व अनन्य भेने पर आवहि दृष्टि न झष्टि गहों है । खुछम रूप अरूप सदाइमि ब्रह्म अगरचर रूप कहो है ॥ १ ॥ आदिअवादिअनन्तअनूपअछेदअभेद्अलेखअजाण्डित । अच्युतनाथअचिन्त्यअभयपदअदभुतभूवअभूतछमण्डित ॥ आनन्दमूछअमल्यअगाधघअनाहदआ क्तिकोब्मचाण्डित । जासु अनन्यभमने सुखरूप स्रों रूपानिरूप निरूपाते पण्डित २. ॥ निशुन सरशन कौन गुने , पुनुरूप नहीं वह को रुँखि आयो। एकः अनेकं विशेष नहीं , अरुदृर नजीकनहींडिक ठायो ॥ अनिवैचनिय अनन्यभनै , कहते न बने हँ विना दी वनायों । पूरन जह्य सचे पर पूरन , पणे भये त्तिन एरन पायो ॥३॥ महयत्मा द्ादुदुयार ने भी सवर को निराकार জনা ই | यथा-- अंधिनासी सो सत्य है, ठपजइ विनसईं नाहि । জা कहिये कार मुख, सो साहिब किस माहिं ॥ साई मेरा सत्य है, निर्जन निराकार । दाद्‌ विनस्ड देवता, झूठा सब जाकर ॥ শি




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