कवित्तावली | Kavittawali

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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महि जष्टं अन्नं वसं फटे पुष्पमालं से है,आस्न रजतं सोच पनि छत ` निये | दीप पदत्रान गो' ' सुरगंधघित सुबस्वु द न,विद्या-दान इन सोरहों ते बड़ पनिये ॥ स्यस्वकं अनेकपाद्‌ रर अपराजि्दं भ,बहुरूपं विरूपाक्ष अद्ुध्नं जा ये | मारि सुरेश्वरं जयन्ते हैर दर-काल,एकादश रद्र-भक्त' उर-पहें आ ये ॥३३।दिशा, दिग्पाल और पंचत तपरेव म इन्द्रः आनेय में 'अगिनदेव',दक्षिणं में 'यमराज' मित्र ! अनुम निये ॥ नेकुत्ये में 'नेक्ुत' औ परिचर्भ-'वरुणदैः ,वायव्व पर वायु घट-पट वारो ज नय । उत्तर में 'घनपति” देकर? इशार्न कोन,ऊपर विधाता नीचे विष्णुः उ आनिये | छति जं अरम अनि नम मक्त भदस दिग्पार, पचतस्व पहचानिये । ३४) दिन, मास भोर ऋतु चेन बइमारवे में वसन्तः की बहार अवे,जेठे आओ असारई 'ग्रीष्म'-दाइ दुखद। नेये | सावनं जौ माद में ववक्ष भमोद देत,सरद' कुआार जोर कार्तिक बखारि पे ॥




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