सागरधर्मामृत | Sagardharmamrat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सर्वा्टीण खहस्थधर्म और मुनिधर्मकों वतानेवाले यदि कोई झा जैनसमाजम हैं तो वह विक्रमकी तेरी शतान्दिमें लिखित विददये पंडित आश्ाघरजी कृत अनगारधर्माम्त और सागारघर्मास्तत ही है। अनगारधर्ममृतमें मुनिर्धाक्ता और सागारघर्मामृतमें ग्यस्‍्थधमक्रा विस्तृत कथन है। इन दोनों अन्‍्धराजेम अनगरघर्मामृत सूछ ( संस्कृत टीका सहित ) माणिकचद्ध दिष्जैन अस्थमाठा द्वार तथा भाषाबचनिका सहिति सेठ नाथारंगजी ग्रन्थमाछा द्वारा प्रकट हो चुका है और सागारघर्मामृत संस्कृत टीका सहित कश्बार प्रकट हो चुका है। तथा भी प० छालारामजी जैन शास्त्रीकृत हिन्दी टीका सहित पुर्वाष और उत्तार्द्ध अलग रे हमने वीर से० २४४१ और वीर से० २४४२ में प्रकट किये थे, उनके खत्म हो जानेते कई वर्षोसे उनकी दूसरी आदृत्तिकी मांग हो रही थी इसलिये हम पुनः प्रक् कलेवाले थे कि हमें मादूम हुआ कि जैनसमाजक्े धुरंधर विद्वान्‌ और श्री० स्वगीय वादिगज-केशरी न्यायवाचस्पति प० गोपालदासजी बरेयाके अनन्यत्म शिप श्री० व्याख्यानवाचस्पति प० देवकीनंद्नजी सिद्धांतशार्त्री कारंजा इस सागार- धर्मामृतकी मवीन टीका बना रहे हैं, अत; इसवार वहीं प्रक: की जाय तो चह दि० जैन समाजको अधिक उपपोगी होगी। ऐसा विचार करके इस विपवर्म उक्त विद्वान पंडितजीसे पत्रव्यवद्गर किया तो आपने इसे प्रकट करनेक्री हमें सह स््रीकारता दी। यहाँ तक कि इसके परिभ्रमका कुछ भी पुरस्कार ठेमा भी पंडितजीने उचित न समझा | फिर हमने इस महत्‌ कार्यको छः माह हुए प्रारंग किया था जे आज पूर्ण होकर पाठकोंके समक्ष आ रहा है। इसके आरंभ इस ग्रस्थके स्चयिता विद्नहय प० आशाधरज्ीका विह्तृत परिचय जैनसमाज्के हान्‌ साहिबयसेवी विद्यन्‌ पृ० नाथूरामजी प्रेम्मीस नये सिरेसे लिखाकर प्रकट किया है। तथा इसके अतिरिक्त प्रारंभमे सागारधर्ममृतके आठों अध्यायोंका सारांश व चिश्लृत विधय-सूची और अन्तमें अक्रारादि मे छोकतूची भी, जो इस अन्‍्यके टीकाकार श्री० पे० देवकीमेस्नजी शास्रीने परिक्रमपूर्वक तैयार कर दी है वह भी प्रकट कर दी है, जिससे सोनेमें सुगंधिकी कहावत चरिताथ हे गई है | सारांग यह है कि श्र्स मन्थराजकी जहाँतक होसका; सर्वांगसुंदर बनानेका प्रयक्ष किया गया है। अंत्मे इस ग्रव्धराजकी निःस्वार्थ टीका कर देनेवाले जैमसमाजके धुरंधर विद्वान्‌ पै० देवकीनेदनजी सिद्धांतशाह्लीका और मूल अन्यकर्ता विदृदर्य शरी० पे० आशाधरजीका विस्तृत परिचय तैयार कर देनेवाले जैन साहिदसेवी थरी० एै० नाधूरामजी प्रेमीका हम हादिक आभार सानकर यह भावना भरते हैं कि भाषा टीकासय इस अन्थराज द्वारा जैनसमाजमें सच गहस्थधर्मके पठनपाठन वे पालनका प्रचार हो और शीघ्र ही इस ग्रन्थक्ी दूती आइत्ति प्रक/ करेक्ा सौभाग्य प्राप्त हो | निवेदक--- सूरत-बीर सें० २४६६ भूलचन्द किसनदास आश्विन वदी ५ [ क्रिसनदास कापड़िया, ता; २ १--९--४० “प्रकाशक |




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