मीरा स्मृति ग्रन्थ | Meera Smrit Granth

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Meera Smrit Granth by डॉ. रामप्रसादत्रिपाठी - Dr. Ramprasad Tripathi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(2) ) उपयुवत सूक्ष्म विवेचन से यदद प्रतीत होता है कि मीराँ किसी सम्प्रदाय चिशेष से संबद्ध न थीं । उन्होंने कृष्ण से अपना सम्बन्ध सीधा स्थापित कर लिया था। उनकी भक्ति अधिकतर वियोगात्मक थी । किसी शुभ क्षण में या स्व में वे उनकी झलक देख लेतीं कभी-कभी उनके साथ खेलने का भी अनुभव कर लेतीं किन्तु साधारणतया वे विप्रयोग प्रेम की मघुरिमा से उन्मत एवं छुकी कभी आंखुओं की माला पोहती रइती कभी कोकिला-सी कूक उठतीं कमी मयूरी की तरह नाव उठतीं कभी मौन कभी मुखर उद्दिसिता से रात-रात भर प्रतीक्षा करती और तपती आलपती रद जातीं । इस प्रकार सखि नि्रानुरागात्प्राह्तोय॑ निखिल गोपिक- कात्स्यमू को चरितार्थ करतीं । प्रेमोन्माद॒ का लोकिक रुप ही भीतरी तथा बाहिरी जीवन में विप्ठव करने की छषमता रखता है। घह प्रेमी को बादरो जात से खींच कर मानसिक कार्पनिक आन्त रिक छोकों में न जाने कहां-कहां घुमाता फ्दियता रददता है। तो 1फर यदि बह धठो किक लोक तथा आारक्तदीघनयनों नयनाभिरामः कन्दपंको टिललितं घपुराद्धान ः भूपात्सम्रेध्य इद्यांवुरुद्दादवर्ती चुन्दाटवी नगर नागर चक्कचर्ता के अपार अनिवंचनीय सौन्दय॑ छालित्य छावण्य और माघुय की छुटा जिसके स्वप्न अथवा कट्पना में भी ऋलक मार जाती है उसको आत्म- स्उति के लिर अयवा सीमाश्रस्त बुद्धि के संचारी चंचछ ज्ञान के लिए स्थान दी नहीं रद जाता घह चकित और छृताथ होकर ठहर खाता रहता है । उसके छिए तो काज छाज समाज लोक परलोक अपना पराया आदि ज्ञीचन के जितने व्यापार हैं सब चिडम्बनामय दो जाते हैं। उसकी मनोवृत्ति




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