पृथ्वीराज में प्रणाम | Prithviraj mai Pranam

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Prithviraj mai Pranam by डॉ. मनोहर शर्मा - Dr. Manohar Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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1११ (४) दरिद्र रो दान बे जादयो ही हो तो आया बयो हा ? जदनरेई थे आद्वो तो विदा मांगता ही आप्रो हो। माचक | मैं तो थारी दान-ब्ीरता री घणी प्रशंशा सुण रासी ही, पर भा उट्टी रीत बयों ? जे जाव्रशो ही हो तो काया बयों हा ? महारे और थारो कोई पता रो संबंध है काई? ओर जे नहीं, तो बस रहार हो बने मागण नै बयों बातों हो ? हूँ दरिद्, दरिद्र सू भी दरिद्, हूं और ये हो म्हारा सप्रेस्त। लो, देखो ! इण वार पाने ही त्याग त्याग रो थाद्श देखाऊ हूं । जे जाद्णों हो हो तो आया बयो हमारे




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