वाजिद अली शाह | Vazid Ali Shaha

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Vazid Ali Shaha by आनन्दसागर जी महाराज - Aanandasagar Ji Maharaj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बाजिद धसी दाह शद कागजात पिए चाहे पगथ के हुषम के पागन्द रहते । पिंघने दितो उर हिल धड़कते की नमी बौमारी हुई भौर ठग है भव तक पूरे दो माह सोग इस सवारी के लिए देचैत भौर परेणान ठे 1 प्राज षह पब सपा सार बाजिदं भनी छाहू की सेहत के लिए तारे बुसस्थ कर रहे थे जिससे उतके उत्साह का शात होता भौर शाइ की सोकप्रिपता स्पष्ट हो चाती । सबारी यों हो मियां शान भौर चौने थी के करीब थाई एक लेड स्वर हुभा भौर चलता हुपा जुशूस जहाँ का तहाँ इक पया । छिपी शष्ठ मै शाहे भ्रषष के इंसाफ को मरी पूरी थगता में चलकर कर उत्साहित भीइ को हैरान घौर परेणान कर दिया । लख नऊ के इतिहास में पहली बार डिप्टी ने बसते जुलूस को रोकने का बुइमनीय पाहस क्या था । चारों तरफ हलचल धघौर फुसफूताइट पारम्म हो जाना षिर्कुल सामूहो बात थी । सवारी श्की पौर बदौर प्रमीदृहरौमा षो र्पौरियों पर बल पड़ णये । उस्देंगि पौड़े की रास फेरी भौर चारों घोर प्रदत सूचक हप्टि थे पूण । फिर बहु एज समाते पे पष के तामम्परम के बिस्कुल निकट भा गये । फरियादी भ्रब तक भज्ञात था । कष्ठ शिसी स्थी का था पौर सोप 'प्रपतै-झपते मस्तिष्क से विभिसत कस्पनायं कर रहे थे। बजीर की से पत्त प्रहिपल चदती था रही थीं। पे भगष से तामम्य्ाम के दोनों बाजू (4 मुष्टो ठे यकु शिवि ये पौर पार्ये पपन चारों भोर बुर 1 तभी एक जिस्तान रपी बयोर के थोड़े के निकट था एड़ी हुई। उसने विदेशी कपड़े का सौचा साया घौर दरों हें चप्पत पहुत रती चौ। उदकी भांखें बदल गम्मीर भौर परेणान भम्र भाई । बह बजीर




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