शरत समग्र खंड - 4 | Sharat Samagra Khand - 4

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Sharat Samagra Khand - 4 by विश्वनाथ मुखर्जी - Vishwanath Mukharjee

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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किया है। मैं फिर लौट आऊँगी। लडको मे तू तो मेरे साथ नही जा सकेगा विपिन तेरे ऊपर ही इतने बडे परिवार का सारा बोझ है। और पीछे जों लडका खडा हुआ है उसे साथ लेकर मैं वैकण्ठ भी नहीं जाऊँगी। ब्राहमण का लडका होकर स ध्या-गायत्री तो बहुत पहले ही खत्म कर चुका सुना है कलकत्ते में खाने-पीने मे भी विचार नहीं करता। इस पर कल उसने कया किया सुना है? विप्रदास ने भोल आदमी के समान कहा और क्या किया इसने? नही मैंने तो कुछ भी नहीं सुना। माँ ने कहा- अवश्य सुना है। तेरी आँखों को धोखा देगा इतनी बुद्धि इस लडके मे नही है। लेकिन इसकी कछ रोकथाम कर। यह हमारा ही खायेगा-पहनेगा और हमारे ही रुपये से कलकत्ते से आदमी बुलाकर हमारी ही प्रजा को बियाडने की कोशिश करेगा। इसका कलकत्ते का खर्च तू बन्द ही कर दे। विप्रदास ने विस्मित होकर कहा- यह कया कहती हो माँ पढाई का खर्च बन्द कर दूँ वह पढेगा नही? मॉने पूछा- क्या आवश्यकता है? मेरे श्वसुर की पाठशाला के लडको के दल ने जब आकर कहार्कि विदेशी पढाई-लिखाई से देश का सत्यानाश हों रहा है तब तू बेत लेकर उन्हें मारने दौडा था। और अब तेरा छोटा भाई जब ठीक उन्ही ज्ञातो को कह रहा है तो इसका कोई विरो ध नही करेगा? यह तेरा कैसा विचार है? ः ठिप्रदास ने हँसकर कहा- इसका कारण है माँ 1 स्कूल मे उन्नति न पाने का उलाहनों मैं सहन नही कर सकता लेकिन द्विजू के समान एम० ए0० सत्तीर्ण करके विलायती शिक्षा के प्रति अपशब्द कहना मुझ्ने चुरा नहीं लगता। ्‌ माँ.बोली- परन्तु मेरें ही रुपयो से मेरी ही प्रजा को उकसाना यह बात कैसे होगी? अब तक द्विजैदास चुप था एक भी बात का उत्तर उसने नही दिया। अब उसने कहा- कल क्री सभा-समिति के लिए तुम्हारी जमीदारी का एक पैसा भी मैंने अपव्यय नहीं किया। कमरे में आने के बाद से माँ ने एक बार भी पीछे की ओर नही देखा था इस बार भी नही देखा। ते से ही पूछा- तो नालायक से पूछ तो सही कि रुपया कहाँ से पाया? क्या कही नौकरी कर रहा र हक क की श्ि ड् ढ ठीक इसी समय पर्दे के बाहर आहिस्ता से चूडियो की खनखनाहट सुनाई दी। विप्रदास ध्यान से सुनकर बोला- यही तो इसका उत्तर है माँ यदि तुम्हारे घर की बहू रुपये देती है तो मना कौन करे तुम्ही बताओ? थे _ माँ को याद आ गयी। वोली- हाँ यही वात है। यह काम उस सती का ही है। वडे बाप की लडकी है और बाप की जमीदारी से सालाना हजार रुपये पाती है वह बात तो मैं भूल ही गयी। वह अपने योर्य देवर को रूपये दे रही है फिर कुछ शान्त होकर बोली- तेरे ब्याह के लिए जब समधी स्वय आये उसी समय मैंने मालिक से कहा था कि रायवश की कन्या घर मे लाने की आवश्यकता नहीं। उन्ही के घराने के अनाथराय ही ने तो विलायत में मेम से शादी की थी। वे जो चाहे सो कर सकते हैं। ससार मे उनके लिए असम्भव क्या है? विए्रदास हँसकर चुप रह गया। उसे मालूम था कि सती के भाग्य मे यह ताना लिखा है। उसके मायके के सम्बन्धियों मे किसी अनाथराय ने बयाली मेम से शादी की थी यह बात माँ भूल न सकी। सभी को मौन देखकर उन्होने फिर कहा- अच्छा जाने टो। बाबा कैलासनाथ इस बार याद कर रहे हैं उनका दर्शन कर आऊँ तब इसका प्रबन्ध करूँगी। इतना कहकर वह कमरे से बाहर निकल गयी। विप्रदांस ने कहां- दयो द्विजू माँ के साथ जा सकेगा? जब उनके हृदय मे यह बात जम गयी है तब उन्हे रोका जा सकेगा इसकी मुझे आशा नही। द्विजदास ने उसी दँम अस्वीकार करते हुए कहा- आपकको मालूम तो है कि देवी-देवता ओ मे मेरी श्रद्धा नहीं है। इसके सिवा माँ मेरे साथ स्वर्ग मे भी जाने के लिए प्रस्तुत नही है यह तो आप उन्ही के मख से सुन चुके हैं। हर डे विप्रदास झल्लाकर बोला- हाँ सुना पण्डितजी पर तू जायेगा या नही यह कह? मुझे अभी मरने की फ्रसत नही। इतना कहकर दूसरे प्रश्न के सुनने से पहले ही द्विजदास कमरे से जाहर निकल गया। शरत के उपन्यासविग्रदास पपणण दे




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