बुद्धिधन | Buddhidhan

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Buddhidhan by मुनि नथमल - Muni Nathmal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १३ )महाराजा-प्रिये ! ऐसा कोई सड्डृट नहीं पर हां किसी आव- श्यक विचारमें लीन हूं. ४महारानी-पृथ्वीनाथ ! यथाये है, परमात्मा आपको किसी सडुटमें मग्न न करें दासीके सुखसे यह बुरे शब्द निकल पढे आप करूपाकर क्षमा कीजिये और उस आवश्यक विचारकों प्गठकर मेरे दिलको शान्त कीजियेमहाराजा-झुवदने ! किसी मत्लुष्यने मुझे विना नामका एक पत्र लिखभेजा है उसमें लिखाहे कि, क्रोडीमठ वढा नमक हराम है, कलवाढी वात उसने छोगोंमें जाहिर करेंदी है, अब इसको रखना उचित नहीं, छाहोरीमलको मंत्री पदूपर नियत किया जाय प्रिये |! वात तो कुछ नहीं है किन्तु भें अपनी मजाक दिल दुखा- कर कोई काम करना नहीं चाहता, अब मैं इस विचारमें हूं कि, यह काम किसका है, पत्रका लिखने वाला कोन, और क्रोडीमछने उस वातकों ऐसे रूपमें कही या नहीं कि जिससे प्रजाक्े अज्ञान्ति- का फरिण हो,' महारानी-स्वामीनाथ ! हकीकृतमें याद क्रोडीमलने उस वातकोंलोंगोमें बुरे रूपयें जाहिर की है तो यह उत्तरी मूर्॑ता है, पर में “नहीं भान सकती कि क्रोटीमलने उस बातकों कही हो.महाराजा-मिये ! क्रोहीमछके कहनेका एक कारण हो सकता है कि छाहोरीमहूका परिचय मेरेसे कहीं वदू न जाय,महारानी-इसमें राहोरीमलका क्या सम्बन्ध ? और छाहोरी- मलकी क्या हाने !महाराजा-लाहोरीमलके नामपर उस बातकों कही होगी कि जिससे पजाके अशान्तिका कारण हो, और मैं उसपर क्रोषित होऊं,




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