पंचास्तिकाय प्राभृत | Panchaistakaya Prabhart

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Panchaistakaya Prabhart by जयसेनाचार्य- Jaysenacharya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पडद्गत्य- पंचारितिकाय वर्णन गाथा १ ४ अथ सजावतारः- ह पा ह अधान्र नमो जिनेभ्य/ इत्यनेन जिनभावनमस्काररूपमसाधारणं शारूस्यादों मडुलझुपात्तम | गाथा--१ इंदसदवंदियाणं तिहुअणहिदमधुरविसदवकाणं । अंतातीदगुणारं णमो जिणाणं जिदभवाणं ॥ १॥ इन्द्रशतवन्दितेभ्यस्तिशुवनहितमधुरविशुदवाक्पेभ्य; | अन्तातीतगुणेभ्यो नमी जिनेभ्यो जितमवेभ्य; |, १ ॥ अनादिना संतानेन अदत्त माना अनादिनेव संतानेन प्रवत्त मार्नेरिस्द्राणां शततैब॑र्दिता ये इत्यनेन स्द देवाधिदेव त्वात्तेपमेषासाधारणनमस्काराहंत्वमुक्तम्‌ । निश्वुवनभूधध्वाधो- मध्यलोकवर्ती समस्त एवं जीवलोकस्तस्मे निर्व्याबाधविशुद्धात्मतत्तोपलम्भोपायामिधायि- त्वाड्ित, परमार्थ रसिकजनमनोहा रित्वान्मधुरं, निरस्तसमस्तशंकादिदोपास्पदत्वादिशद॑ चावय॑ दिव्पो ध्यनिर्येपामित्यनेन समस्तवस्तुयाथा त्म्योपदेशित्वात्‌ प्रेचावत्मती क्यत्वमास्यात्म्‌ | अन्तमतीतः चेत्रानवच्छितः कालानवच्छिन्नश्व परमचेतन्यशक्तिविलासलक्षणो गुणो येपामि- त्यनेन त परमाद्भ्नतज्ञानातिशयप्रकाशनादवाप्तज्ञानात्तिशयानामपि योगीन्द्राणां पन्चत्वप्ुदि- तम्‌ । जितों भव आजवंजवो ये रित्पनेन तु कतकृत्यत्वप्रकटनात्त एवान्येपामकृतकृत्यानां- शरणमिस्युपदिष्टम । इति सर्वपदानां तासयम्‌॥ १॥ | अब इन आठ अगर अधिकारोंमेंसे पहले ही सात गाथाओंसे समय शब्दके अर्थकी पीठिका कहते हैं | इन सात गाथाओं मेंसे दो गाथाओंमें इष्ट व मान्य व अधिकारप्राप्त देवताको नम- स्काररूप मंगलाचरण है | फिर तीन गाथाओंसे पंचास्तिकायका संक्षेप व्याख्यान है। फिर एक गाथासे काल सहित पंचास्तिकायोंकी द्रव्यसंज्ञा है। फिर एक गांथासे संकर व्यतिकर दोपका त्याग है। इस तरह समय शब्दार्थकी पीडिकामें तीन स्थलके द्वारा सम्रुदायपातनिका' फही है । ह है 3 बी गाथा १- का * अन्वयार्थ:-- ( इन्द्रशतवन्दितेभ्यः ) जो सौ इल्द्रों से बन्दित हैं, ( त्रिथुवन--हितमधुरविशद्‌- वाक्येम्य: ) तीन लोक को हितकर, मधुर एवं बिशद्‌ ( निर्मल, स्पष्ट ) जिनकी, न ( अम्तातीत- गुणेभ्यः ) अन्त से अतीत (रहित) अनन्त गुण जिन में हैं और ( जितभवेभ्यः ) जिन्होंने भव (संसार) पर विजय प्राप्त की है ऐसे ( जिनेभ्यः ) जिनों को ( नमः ) नमस्कार हो |




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