अथ प्रतिक्रमण की विधि भाग 1 | Ath pratikaran ki Vidhi

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Ath pratikaran ki Vidhi  by हर्षचन्द्र - Harshachandra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(७) वन्‍्दोजैनवरम्‌ ॥ ५८८४४ टाइप पा 2 7:< 7%%<% के % अथ ग्रतिकरमण प्रारमे ञ 22% 20297४::#72 12%: ् ) 25 अथ इच्छामिण मंते का पाठ ॥ १॥ - >> +्अन रियो त>1 इच्छामेणं संत तुब्भेहि अमणुणायसभाणे देवासेय पढ़िकमण ठाएमि, देवसियंणाण दंसण चरित्ताचरित्त तप अतिचार चित णाथ कोमि कौउस्सरग | , थ .इच्छास ठाम का पाठ ॥ २ ॥ इच्छामिं ठामि काउस्सरंग जो मे देवासिओं अइयारे कओ, केाइओ, बाइओ, माणा[सेओ) उस्सुत्तों उमभ्गो अंकप्पो अकर- णिज्ली दुज्शाओ दुर्घिचितिजों अणायारी आंगेच्छियच्वो,अंसांवग पाउग्गों नाण तह दर्सण - चरित्तार्चरित्ते सुप सामाइए तिन्ह गुत्तोणं, चउन्हें कसायाणं, पंचन्हमंजुच्व॑याणं, तिनन्‍्हे गुणंव्वयाण, चरउन्हे सिक्खावयांणे, वार्संविंहस्स सावगधर्म्मरस ज॑ खीडये जे विशहिये तस्से मिर्च्छामि दुकेद ॥ ' अर्थ आंगमें तिविहे का पाठे ॥ ३ ॥ अभिमे तिविहे पंण्णत्ते तंजहां|सुत्तागमे अत्थागम तदभयागमे एहवा श्री ज्ञान के विषे जे कोई अतिंचार छागो होय ते आंलोर्ड




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