अथ समयसारस्य | Ath Samaysaarsya

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Samayasar Shrimaddabhagavtkundkundacharyavirachita by कुन्दकुन्द - Kundkund

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(४ ) से हुए अपने भावों से मिलन जाने, अपने शुद्ध स्वह्प का अनुभव कर शुद्धोपयोग में लीन हो तब अभाव करके निर्वाण को पाता हैं। इस प्रकार इस हितीय शुद्धनव के उपदेश के पंचास्तिकाय, प्रवचनसार, समवसार, परमात्म प्रकाश आदि ज्ञास्त्र प्रवर्ते हैँ। उनमें यह समय प्राभृत सार) वामा ज्ञात प्री कुल्दकुल्दाचार्यक्ष प्राकत भाषामय गायावद्ध है। उसकी बात्मत्वातिनामा उंस्छृत ठोका बमृतचंद्र मे को है, सो कालदोप से जीवों की वृद्धि मंद होती जाती हैँ उसके निमित्त से प्राह्मत संस्कृत के दाले विरले रह गये हैं । और गुदमों को पर्रपरा का उपदेश भी विरला हो गया, इसलिये बपनी वृद्धि के अनुसार ग्रंथों का अभ्यास कर इस ग्रंथ की देश भाषासमव वचनिका करने का प्रारंभ हैं। जो भष्य जीव वादेंगे पहुंगे सुनेंगे उतका तात्पर्य धारेंगे उनके मिच्यात्व का ज्माव हो जायगा, सम्बन्दर्शन दो प्राप्ति होगी ऐसा लभ्िष्राय हैं । कुछ पंडिताई का तथा मान लोस दादि का अभिप्राय नहीं 1] ् य्धु | (21% था ्् /2॥ त्यड 4 अन्यात | डर 3॥ का है। इसमें कहीं वृद्धि की मंदता से तथा प्रमाद से हीनाविक अर्थ लिखू' तो बुद्धि के घारक जनो ! मुछरंय देख चुद्ध कर वांचना, हास्य नहीं करना, पंयोंकि उत्युरुपों का स्वनाद गुषग्रहण करने छा हीं है। यह मेरी परोक्ष प्रार्थना है । यहां कोई कहें कि 'इस उम्यस्तार ग्रंथ की तुम दचनिका करते हो, यह अध्यात्म ग्रंव है इसमें घुद्धनव का कथन है, अलश्लुद्धनय व्यवहारतव हैं उसको ग्रोगकर अतत्वार्थ कहा हैं। वहाँ पर व्यवहार चारित्र को और उसके फल पुण्यवंच को अत्यंत निषेध किया है । मुभिव्नत भी पाछे उसके भी मोक्षमार्ग नहीं है ऐसा कहा हूँ । सो ऐसे ग्रंथ तो प्राह्ृत संस्कृत ही चाहिये। इनकी वचनिका होने पर सभी प्राणी वांचेंगे । तव व्यवहार चारित्र को निष्प्रयोषन जानेंगे, बरुचि जाने से अंग्रीकार नहीं करेंगे तथा पहले कुछ अंगीकार किया है उससे भी ज्रष्ठ होके स्वच्छंद हुए प्रमादी हो चार्येग । श्रद्धान करा विपर्यव होगा बह बड़ा दोष आयेगा ! यह ग्रंथ तों--छो पहले मुनि हुए हों, दृढ़ चारित्र पालते हों, शुद्ध मात्मस्वरुप के सन्मुख न हों और व्यवहार मात्र से ही विद्धि होनें का बाशय हो उनको चुद्धात्मा के सन्मुख करने के लिये है, उन्हीं के सुनने का है । इसलिये देश भाषामव बचनिका करता ठीक नहीं हैं ?” उसका उत्तर कहते हैं-- यह वात तो सच हूँ कि इसमें झुद्धनव का ही कथन हैं परंतु जहां जहां बदुद्धनव रूप व्यवहरतव का गौपता से कथन है दहाँ बाचाव॑ ऐसा भी कहते जाये हूँ कि पहिल्ी अवस्या में यह व्यवहारतय हस्तावलंवरूप है वर्थात्‌ ऊपर चढ़मे को पैड़ी रूप है इसलिये क्र्षंच्ित्‌ कार्यकारी हैं । इसको गोण करने से ऐसा मत जानता कि आचार्य व्यवहार को सवंधा ही छुड्ाते हैं, बादार्य तो ऊपर चढ़ने के लिये वीचली पैड़ी छुड़ाते हैं। जब मपने स्वरुप की प्राप्ति हो जायनी तब तो बुद्ध बजुद्ध दोनों ही तयों का भालंवन छूट लावगा | नय का बालंवन तो सावक बदच्या ऐसे प्रंथ में जहां जहां कवन यवाथ समझने से श्रद्धान का विपर्यय नहीं छः हैँ उसको होगा। जो यवाव समझेगे उनके व्यवहार चरित्र से बरुचि नहीं होगी | ओर जिनकी होनहार (मविदव्य) है छोटी हूँ वे तो शुद्धव॑य सुनें मय॒दा अनुद्धनय ही समझेंगे। उनको तो सब ही उपदेश् च्प्फि्लि यु चिष्फद हूं 1 यहां हां तीन प्रयोजन मन में विचार के प्रारंग किया है। प्रथम तो अज्ञमत्ति वेदांती तथा सांख्यमती दत्ता को उर्वयथा एकांत पक्ष से चुद्ध नित्य समेद रुप एक ऐंसे विशेषयों कर कहते हैं, और ऐसा कहते हूँ क्षि रजनी कर्मवादी इसके बात्म की कवनी नहों है। बालझाव के दिना “बुधा कर्म का क्‍लेश करते हैं की दिना जाने मोल नहीं हो सकता । जो कर्म में हो छोन हैं उनके संसार का दःख कैसे मिट सकता ईंदवरवादी नंयायिक कहते हैं कि ईश्वर उदा चुद्ध है नित्य हैं सब कायों के प्रति एक निमित्त दे: विना जाने व उसको सक्तिमाव से बिना घ्याये उंतारी जीव का मोक्ष नहीं, ईश्वर का चुद्ध 8 जो! जी] दशा न] नदी धर न अककन के | ' ३




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