निरुक्तम् भाग - 1 | Niruktam Bhag - 1

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Niruktam Bhag - 1 by महर्षि यास्काचार्य - Maharshi Yaskacharya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रद निरुक्त (निघण्टु) परोक्षकृत मन्त्र:में सभी विभक्तियाँ तथा प्रथम पुरुष के एक वचन में आख्यात आता है “परोक्ष प्रिया हि वे देवाः” देवता परोक्षत्रत्ति से प्रसन्न होत हैं ; यथा, “इन्द्रों दिव इन्द्र ईशे पुथिव्या: इन्द्रसित्‌ गाथिनों बृह- दिन्द्रे गोततृत्सवोचेविषाणा इन्द्राय साम गायत” इत्यादि परोक्षकृत मन्त्र सम्पूर्णा विभक्तियों में आते है । प्रत्यक्षक्रत सन्‍्त्रों में सबेनाम ओर सध्यम पुरुष आख्यात आता है, “त्वमिन्द्र ! बकछादुधि विन इन्द्र मथों जहि?!। हे इन्द्र तुम सबसे बलूवान्‌ हो तुम तेज को चर्षण करनेवाले हो । सर्वनाम उत्तस पुरुष जाख्यात योग से आध्यात्मिक मन्त्र क्षात हैं यथा “अहं रुद्रे सिर्वसमिश्चराम्यहसादित्येस्त विश्चदेवः । अहं मिश्नावरुणो भा विभम्यहसिन्द्रात्नी अहसश्विनोभा” वाणो देवता रूवयं कहती है, में रुद्र, वख, आदित्य, विश्वामित्र मित्रावरुण के साथ स्त॒ति रूप में आती हुँ ओर इन्द्राक्‍्नि देवता को हृविष्य में घारण करती हूँ इत्यादि । परोक्ष- कृत ओर प्रत्यक्षक्तत वेदों में अधिक हैं आध्यात्मिक संक्षेप में आये हैं ।' कहीं रुतुति रूप म॑ कहीं आशीर्वाद रूप में ये मन्त्र आते हैं कहीं शाप के रूप में सी । एक समय किसी ने वशिष्ट को कह दिया “अय्या मुरीय यातुधानो यव्िअल्मिए--अधा स॒ वीरेंदेशसिवियूया यो सायावो यातुघानेत्याह” चशिष्ट ने कहा यदि में राक्षस हूँ तो अभी मेरी झत्यु हो जाय अन्यथा जिसने क्रोधावेशमें भूठे ही मुझे कलड्ठित किया है वह अपने देश सन्‍्तान से [वयुक्त ओर शोकग्ररूत हो जाय । निन्दाप्रशंसा परक भी इस प्रकरण में मन्त्र आये हैं “मोधमन्लं




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