रामायण भाग - 8 | Ramayan Bhag - 8

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Ramayan Bhag - 8  by गोस्वामी तुलसीदास - Gosvami Tulaseedas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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डे । _रा०्फा०-४ ह गुरु-चरण वन्दना # ह २५ कुन्दु इन्दु सम देह, उमा रमण करुणा अयन। जाहि दीन पर नेह, करहु कृपा मर्दन सयन ॥ ४ ॥ कुन्द-पुप्प और चन्द्रमा के समान देह वाले, पार्वती के साथ विहार करने वाले, दया के स्थान,दीनों पर स्नेह-फर्ता हैं, ऐसे कामदेव को भस्म करने वाले शिवजों मेरे ऊपर क्रपा करें । बन्द गुरु पद कड्ज, कृपासिधु नर रूप हरि। कि महामोह _ तम पुज्ज, जासु वचन रविकर निकरि ॥ ५॥ से गुरुदेव फे फमल-स्वरूप चरणों की वन्दना करता हूँ,नो दया के समुद्र और मनुष्य- रूप में साक्षात्‌ श्रीहरि ही हैं और जिनका वावय सदा अज्ञानी रूपी महा अन्धकार को नाश दारमे में सूर्य को किरणों के समान है । बन्दर्स गुरु पद पदम परागा #£ सुरुचि सुबास सरस अनुरागा अमिय सूरिसय .चरन चारू $£ समन सकल भव रुज परिवारू में उन गुरुदेव फे चरणों की बन्दना करता हूँ, जो सुन्दर,स्वादिप्ट तथा अनुरागरूपी रस से पूर्ण हैं। वहु अमृत-बूटी फा चूर्ण हैं,जिससे समस्त संसार रूपी रोगों के परिवार का नाश होजाता है। सुकृत सम्भु तनु विमल विभूती % सञजुल मंगल मोद प्रसूती जन मनु मंजु मुकुल मल हरनी ४£ किए तिलक गुनगन बस करनी वह चरण-रज सुकृति ( पुण्यवान्‌ पुरुषों ) रूपी शिवजी के शरीर की उज्जल विभूति है, सुन्दर कल्याण व आनन्द को उत्पन्न फरने बालो है, भक्तजनों के मनरूपो दर्पण के मेल को हरने वाली है और धारण करने से सब गुणों को वश में करती है । श्रीगुरु पद नख मणिगन जोती %६ सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती दलन सोह तम्र सो सुप्रकासू # बड़े भाग्य उर आवबइ जासू श्रीगुरुदेव के चरणों की नख-ज्योति मणि-समूह के प्रकाश के समान है । उनके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य-हप्टि हो जाती है । वह मोहरूपी अन्धकार को दूरकर सुन्दर प्रकाश फरने बाली है, वह बड़ा ही भाग्यशाली है, जिसके हृदय में वह प्रकाश आता है।.. उघर्ाह विमल विलोचन हिय के $£ मिर्टहि दोष दुख भव रजनी के सून्नहिं रामचरित मनि मानिक # गुपुत प्रगट जहूँ जो जेहि खानिक उस प्रकाश से हृदय के निर्मल नेत्न खुल जाते हैं ओर संसार रुपी रात्रि के दोप, दुःख दूर हो जाते हैँ । श्रीरामचन्द्रजी के माणिक रुपी चरित्र जहाँ और जिस स्थान में गुप्त तथा प्रगर हूँ, वे सब दिखाई देने लगते हैं । दोहा-यथा सुअहजन अण्जिहग, साधक सिद्ध सुजान। कौतुक देखत सेल वन, भूतलत भूरि निधान ॥ १॥। नी ला हर जा




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