कुण्डलियारामायण | Kundliyaramayan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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छुण्जाणिया रामायण । श्३्‌ काल वषश्य वोलत कहा गुक॒की धनुष विहेंड। विप्रव ऐ- झोबोल झुतु व्यप कुल शिरको खंड ॥ वब्वप कुल शिश्की खंड यरश करतो 'तोल्ण धारा। धनु ज्यहितोरों आजुतासु भुजकाटव वबाश॥क काटनवाशथ परश यह ज्यहि काटे भूपति भहा। लहि समेत शामहि हतों काल वष्च बोलत कहा ॥ १०७॥ भूपति मिले नखेतमेँ ठुस्हों विप्र कुल देव। हते ठम्हारे हति गयेदे छिज पढ़ विन सेव॥ ते हिल पद बिन सेव छउदत्ध धर्म नते होने। ते तुम काटे परशु कर कपटो जड़ दोने॥ जड़ दोने व्यप तुम हवे पाप शनि नहिं छेतर्मे। ताते बाढ़े भवनर्में भुपति मिल्ले खंतदशथ ॥ १९०८ ॥ चल विहोौनो महिकरोी परश वार इकबोीस। सो न विद्दित लहि बाल जड़ तुरत जाइहे खोल।॥ तुरत जाइहे खोल बचन मुख बोलु सेभारे। गुरु गुनही भो मौन ताहि तू पीछे ढाशे॥ पाके बचहन कालकेवालक हखि करि वर टरो। परश धार ज्यहि काठिहों लच बिहोनों सहिकरी 1 १०६ ॥ द्विज कुल के नाते ढरों सुनहु विप्र सत माव। नत आलो छलकी सकल छेहु तुरत अबदाव॥ लछेहुँ तुरत अबदाव परश धत्रु सूभि गिराऊँ। धर्मबड़ी रखबार मारि ह्विजपात क प्याऊ ॥ पावक पाऊं शोशपर दूजे रघुपति कर डरों। यमघर ठुममद्ठि बसावतो द्विनक्ल केनाते ढरों ॥ ११० ॥ ले कुठार सच्सम ख धर्मों राम लंघणकी और। कोशिक वर जो बालकहि मोहि नहों अबखोर॥ मोहि नहों अब खोरि करों अब काल दबाले। परश बत्यो स्वद्र हाथ




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