सत्यामृत मानव - धर्म - शास्त्र | Satyamrit Manav - Dharm - Shastra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सत्य-दृष्टि [ १७ | क््लिि जे अजित ++++5+5+ हा +++++++++ : केसे उपयोग करना चाहिये आदि बातों की समझ न हों तो हमारा ज्ञान सत्य-दरशन की दृष्टि से निष्फल हो जाता है | यहां समन्वय का काय किसी की बात को जन-कल्याण के लिये उपयोगी बना देना हैं| इसके लिये नानातरह के विरोधों का यथायोग्य परिहार करना आवश्यक है | समन्वय दो तरह का ४ ४ ४5. होता हैं | (१) आलड्जारिक (२) पारिस्थितिक आलड्ारक समन्वय-इसम घटना के मुठ- व्रणन पर उपक्षा को जाती ६ और रूपक, छेष आदि अछछ्डारों के द्वारा: शब्दा का अथर बदल कर प्राणी की बुराई से मछाई की तरफ छ जाया जाता है | जेंसे किसी न कहा-' हम गोवध जरूर करेंगे, हमारे शात्रों में लिखा ह. और पहिले भी होता था! । इसके उत्तर में आल्छारिक समन्वय- वादी कहेगा, गोवध अवश्य होना चाहिये परन्तु गो का अर्थ गाय नहीं है किन्तु गो का अर्थ इन्द्रियाँ हैं सो उनका वध अथीत दमन अबध्य करना चाहिये! यह गोवध का आलंकारिक समन्वय कहलाया | छड्भारिक समन्वय भी दो तरह का होता दे ।एक उपपन्न दूसरा अनुपपन्न | उपपतन्न सयु- क्तिक रहता हैं आर अनुपपन्न युक्तिशुन्य | शब्दों का अथ बदछते समय अगर अर्थ पसिर्तन की अनिवा्यता सिद्ध हो तो उसे उपपन्न कहेंगे | जसे-विश्वामित्र ने ऋष में आकर दसरी सा्ट का | काइ प्राणी दूसरी सष्टि बना सकता है, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, तोर आदि की रचना कर सकता है यह असंभव आर अविश्वसनीय है इस- ब्ये सृष्ति बनाने को आल्डारिक मानकर इसका वास्तविक अथ नया समाज बनाछेना या नये उप- न्विंश वसा लेना, किया जाय तो यह अर्थ सोप- पत्तिक होगा | इसलिये यह उपपन्न -आल्डझागरिक समन्वय कहलाया | : परन्तु गोवध अथीतू इन्द्रियदमन, ऐसा अर्थ करके समन्वय करना अनुपपतन्न आलड्जकरिक समन्वय हैं| क्योंकि गोबर का पशुवध अर्थ प्राकृतिक या ऐतिहासिक दृष्टि से असंगत नहीं है | इसलिये यहां आल्कछारिक अथ्‌ की अनि- बायता का कोई कारण नहीं है। इसलिये यह अनुपपन्न समन्वय कहलाया । अनुपपन्न समन्वय तथ्यहीन होता है इसलिये बुद्धेकी सन्‍्तुष्ठ नहीं कर पाता, इसी से वह विश्व- सनीय नहीं होता और जो विश्वसनीय नहीं है वह स्थायी वस्तु नही वन सकता । इससे भोले प्राणियों के मनपर प्रभाव पड़ता है. | थोड़ा बहुत प्रांडित्य का चमत्कार भी दिखाई देता है, पर स्थायरूपमें इससे छाभ की अपेक्षा हानि अधिक होती ह । थोड़े से भोले ग्राणियों के सामने थोड़ी दर को छाम होता ह पर पौछि हँसी होती है और अपनी वात का विश्वास भी उठ जाता है | बहुत से छोंग इस अनुपपन्न आलंकारिक समनन्‍्वयका उपयोग घरममद, जातिमद आदि के पोपण के लिये करते है। जैसे-अमुक छोग अग्नि में होम करते थे, इसका अर्थ करना-अग्नि अश्रीत ध्यानात्रि, ध्यानाप्नि तो हमारे ही धर्म की बस्तु है इसलिये वे झोग हमारे ही सम्प्रदाय को मानते 4, इसलिये हमारा सम्प्रदाय व्यापक, महान और प्राचीनतम है | इस प्रकार का समन्वय मिथ्यात्व आर असयम हैं | इस इप्टि से कोश भी समन्वय न करना चाहिये फिर यहां अनुपपन्न-समन्त्य तो बिल्कुल निंथ है |




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