सोहन काव्य - कथा मंजरी भाग - 7 | Sohan Kavya Katha Manjari Bhag - 7

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
116
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)गांव में हर घर के माँही, मिटाऊँ फऋगड़े मैं जाई।
करू कया अपने घर माँही, देख रहा झगड़ा मैं यहाँ ही ।
दोहा--लाल कहे दादा सुनो, जब तक सजा न पाय।
तब तक उसका बढ़े हौोंसला, सहा यह कैसे जाय ।।
बढ़ेगी उसमें णैतानी ।1। सुधा ० 11 २९ ॥।
बाल है तेरा ही भाई, गलती हो देवों समभाई।
लाल कहे समभू नहीं भाई, भरी है उसमें खोटाई ।
नारी के पीछे कहे ऐसी मुख से बात।
ऋर कम उसका है ऐसा कैसे मान्' भ्रात ॥।
प्रापस में हुई खेंचातानी ॥| सुधा० ॥। ३० ॥।
बात यह सुनी सभी नर नार, . सेठ के घर हो रही तकरार ।
लाल कहे सम्भालो घर बार, नार के पीछे यह क्यों राड ।
दोहा--एक एक कर श्रा रहे शने: शर्तें: नर नार।
पिता देख यों सोचे मन में ऐसी करू इस वार 1।
बात सब रह जावे छाती ।| सुधा० ।1 ३१ ।।
नहीं तो लोग हँसें हर बार, कहेंगे घर का करो सुधार।
पराई मेटो श्राप तकरार, प्रतिष्ठा होगी मेरी छार।
दोहा-पिता कहे सुन लाल तू, गुनाह किया जो बाल ।
बड़ा होय माफी कर देना, सुधर जाय सब हाल ॥।
. लाल ने एक नहीं मानी ॥ सुधा० ॥| ३२ ||
लाल कहे रहूं न इसके साथ, कहूं मैं प्रपती सच्ची बात ।
क्रता इसकी सही न जात, बात की हद हो गई है तात ।॥।
दोहा-पिता कहे सुन लाल तू मूरख पर यों रोष ।
बुद्धिमान को शोभे नांहीं तज दो उसके दोष ।॥।
“ बात लो मेरी यह मानी ॥ सुधा० 11 ३३ ||
पिताजी सुन लो निर्णय श्राज, सभी चाहें विगड़े सुधरें काज ।
भ्राये सिर मेरे बुराई ताज, जगत में जावे मेरी लाज ।
दोहा-पर प्रव इसके साथ मैं, रहूं न घर के मांय
यदि प्रापको बालू प्यारा, जुदा करो मुझ ताँय ॥। ला
कहूं मैं चोड़े, नहीं छानी ॥ सुधा० 1 ३
>)
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