सम्मेलन कविताज्जलि | Samalan Kavitanjali

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Samalan Kavitanjali by पुरुषोत्तमलाल - Purushottamlal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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_ सम्मेलन-कविताअलि । शेड “मयंक के प्रति? नील प्याम के सुन्दर दीपक ! शीतलता के भव्य भवन । उस निर्जन बन में अनन्त की, नीरवता में खिले सुमन । आकुलता के सोम्य कलेवर ! मधित-द्वीर--सागर--नवर्नीत । निशा सुन्दरी के भाव॒क पति ! मेरे मानस के संगीत ! सुर सरिता तरड़ माला के, आकुल हृत्कम्पित नाथजिक । घीरे धीरे आओआं ! आओ !! आओ !!! सुस्पित बदन रखिक [. विश्ववेदना के दर्शान-पट 1 मेरे नयनां के झूले 1 आओ | आओ !! निशानाथ ! चिर दुखित कुमु दिनी भीफूले ॥ --श्रो द्वारिका प्रसाद मोर्य्य । “शुति दामिनी की?” पहिले मन मान के बेठी भट्ट सुधि आई न सावन यामिनी की । मनुहार न एक हु मान्येा. अली, मति ऐसी भई गज़ गामिती की । 'सुप्रसिद्ध” इते में अ ध्यारी घटा, घिरिओरे क थे गतिका/मरनीकी | लपटानी सकानी हिये पति के, डरीयें छखिके थ ति दामिनीकी । --प्री प्रसिद्ध नायायण गोड । | जलेगे जलेंगे ! दे नंद नन्दन ! आप बिना दरणागत के दुख कौन दलेंगे। क्या करुणा कर भी कहलाकर याँ छलिया बन आप छल्गे॥ हाय !-न साथ चले यादे नाथ ! निरन्तर हाथ अनाथ मछेगे। आह नहीं, यह आग बुरी ब्रज्ज के बन बाग तड़ाग जलेंगे॥ “शी रामानुजदास बी० प्‌ु० | ही




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