सुलभ कृषि शास्त्र भाग - 1 | Sulabh Krishi Shastr Bhag - 1

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Sulabh Krishi Shastr Bhag - 1  by सुखसम्पतिरायभंडारी -Sukhasampatiraybhandari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विविध प्रवार के साद १5 दोनों में लगभग तिशुना प्रन्‍ पा | इन सब प्रयोगों से उक्त डॉक्टर मद्दोदय ने यद्द दिसलाया है कि पशुओं को दिये जाने बाने चाँटे में नाइट्रोजलन यो जितनी अधिक मात्रा दोतो है ठीक उतनी सात्रा हनऊे गोयर व मूत में निझल आती है। यूरोप के किसानों ने इस बात को खुप अच्छा तरह समझ लिया है ओर इससे उन्होंने अपने ढारों का याँटा भो खूब अधिक बढा दिया है। व अब सममले लगे है कि जो कुछ बाँटा थे म्पिलाते हैं चह फिजूल नद्दी जाता। बल्कि वद्द उनके पश्चुओं की तदुदुस्ती को चढाते हुए उतनो हो कीमत का ख्वाद्‌ तैय्यार करता है । यद्द वो हुई खाद व नाइट्रोजन का सात्रा बढान की याठ | अब इस माता को साद में रस तरह बनाये रखना चाहिये, इस विपय यी चर्चा करना आवश्यक है। ढोरों को चॉघने की जगद में से जिवना भी गोयर और घारोक कूद करक्ट निकन, उस सब का उम्दा खाट बन सकता है । परन्तु अश्मास है कि हारे टेश में इस बाठ की ओर ध्यान नद्दी दिया जाता और इस आगमोल पदार्थ को छ्रिजूल जला दिया जाता हैं । इससे दशा की जितनो आयिक हानि दोंठी है बच चिन्तनोय है । इस ऊपर कद आये हैं कि ठोरा के मूत्र में उनके गोघर से 3) अधिक नाइट्रोज़न रददता है। इसलिये यह चाज्ञ मो फ़ियूल फेंक देने को नहीं है। लेकिन इस देखते हें इस ओर कसानों क्ग बित्दुल ध्यान नहीं है । 1 मृत गोबर आति को यों ही पढा झन




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