अथ जैमनिसुत्रम् | Ath Jaimani Sutrani Jyotisi

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
164
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)भाषादीका, ३
स्थरमन्त्पंविना चरम्। युग्मं खेन विना युग्म॑ पश्य-
गीत्यवमागम/ सोई दूसरे आचार्पनेती हिखा है--
+चरानागवाणेशराशीन् ख़तो वे स्थिर: पट्ठ॒तीया-
इराशीनू कमेण। स्वतः शैल्स वेदर्भ पट्चिसण्य ऋमा-
है.स्पन्ावाः प्रपश्यन्ति पूर्णेम्!” चरराशि अपनेसे नाग
फहियें अम ८ बाण कहिये पश्चम ५ ईश कहिये एकादश
११ वें राशिकों देखता है। और स्थिरराशि अपनेसे पष्ठ ६,
व तोप, और अइ् कहिये नवम्र ५ को देखवा है और दिश्वभाव
पशि अपनेसे शैल कहिये सप्तम ७, बेद कहिपे चतुर्थ और
ड्रि कहिये दृशम १० राशिकों देखता है ! २॥ ३६ ॥
अब राशियोके द्वारा ग्रहोंकी दृष्टि ठिखते हैं।--
तन्निष्ठाश्व॒ तद्॒त्। ९1
अथ--पूर्वोक्त राशियों ( बनवा पु टी
स्थित ग्रहभी पूर्वोक्त स्थानोंमें स्थिद गरहोंको देखवेहं”
थीतू घर राशिमें स्थिव ग्रह अपनेसे ८५११ राशिपय
स्थिव थ्रहकों देखते हैं ॥ और स्थिरराशिमें स्थित ग्रह अप-
वैसे ६॥३॥९ राशिपर स्थित ग्रहको देखतेहँ | तथा दिस्व-
भावराशिम स्थित यह अपनेसे ७1४।॥० राशिपर स्थिव
प्रहको देखते हैं| इस विषयमें वृद्कारिकाका प्रमाण देते हैं-
“चरस्थे स्थिरगः पश्येत् स्थिरस्थं चरराशिंगः । उत्त-
( 4 बूक्षमगों निकटरथ बिना ग्रहम!---घरराशिमें
एक्को ग्रह स्थिर राशिमें स्थित यहको देखदाह और स्थिर राशि-
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