माघमाहात्म्यम | Maghmahatmayam

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10 MB
कुल पष्ठ :
225
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)|:» व्यासजी ने कहा-यज्ञ करने के, बाद अवभ्ृत स्नान करके ऋषियों से मंगलाचार किये हुए, अपने सव नगरवाप्तियों
; से पूजा, किये जाने पर राजा. दिलीप अपने नगर के बाहर निकले ॥ ४॥ राजाओं में श्रेष्ठ सगया का. अत्यन्य रसिक,
राजा दीलिप कोलाहल से बिरा हुआ, तथा आखेट ( शिकोर ) की सामग्री से युक्त था ॥ ५ ॥ उसके पैर जूते से ढके
५६ थे, वह राजा नीले रंग की पगड़ी पहिरे था तथा कबच ( बख्तर ) धारण किये हुए था, ऑॉगुलियों में गोधांशुलिपूजितो नागरेः संबंः स्वपुरान्निगंतो बहिः ॥ 9 ॥ दिलीपो भूभुजां श्रेष्े सुगयारसिको:
भशम् ॥, फोलाहलसमाविष्ट: आखेट व्यूहसंस्थितः ॥ ५ ॥ उपानदुगढ़पादस्तु नीलोष्णीषो
हरिच्छदः ॥ बड़गोधाजुलित्राणो धनुःपांणिः शरी उप: ॥ ६॥ बडक्ुद्रासिवर्मा व तथा
#&., भूतेश्र पत्तिमिः ॥ गहरेघरु च रम्पेषु वमेषु विपुलेषु च॥ ७॥ उल्लड्डितमहाख़ाता. युवा
पश्मास्यविक्रमः ॥ मुदा क्रीडति तेः साथ कुण्जेषु सुगधान्सृगान् ८॥ हन्यतां हन्यतामेषों_( बधनखा ) पहिरे था, और दवाथों में, धुंध और बाण लिये था,॥ ६ ॥ उसके स्रिपाही छोटी तलवार ४ । लिये
हुए गहन तथा बिस्तीण मनोहर जंगल में घूमने-लगे ॥॥ ७ ॥ इनके साथ कुल्लों में शरगों को ह़ने वाले सिंह के समान
| पराक्रमी, अनेक बड़े-बड़े स्रोतों को लॉयने वाले युवा पुरुष आनन्द पूर्वक क्रीड़ा करते थे | ८ ।। “वेग से यह म्गच्ा॥ /&५
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