स्त्री - पुरुष | Stri Purush

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Stri Purush by गुलाबरन बाजपेयी - Gulabran Bajpeyi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नवययुषर्योकि लिये 'काम-विज्ञानकी शिक्षा जरूरी है श्ानन्दमय जाविप्फारों में पेत्द होकर भाग्य तथा मगवान को बोसता ि। यदद मनुष्य फो जद्ललीपन दै। जिसे दूर कर उसे महा मनुष्य घनाने की सरूरत है । टेकिन यद मद्दामनुष्य परसे गे सा सकते हैं हजारों लाएं थी मंरय्या में इन्हें सनन फरने फी तरकीये कया हैं ? इसका एक हो चपाय हैं, समाज में द्सिक दिमाग फे जितने आदमी हैं, हन्हें समाज के बाहर पर देना । इस सरदफे मनुष्य जब सक गीदड़ बच्चे पैदा फरते रहेंगे, समाज में ऐसे धूणित आदमी भरते जायेंगे, जो स्वयं शासन फार्य में तो मूख दोंगि दी, सुयोग्य आद- मिरययों के शासन को भानने के लिये भी सैयार न दोंगे।' अब दमारा युग नये आदमियोंफि इतिहास से शुरू दोना 'वादिये । इस नये इतिदास का आधार शोगा स्पाधीन भारत के मनुप्य का जीवित नया खून । जिसमें रोग फे वीज, और नियुद्धिता की जड़तायें न होंगी। यह खून दोगा निर्मठ, सतेज बुद्धि द्वारा उश्ज्वल और मनुष्य की मदिमा से मद्दान । जिस दिन मारे थीच इस तरदद के मददामनुप्य पैदा होने खंगि-सादित्य, शिल्प और उठित कठा के सम्बन्ध में उनकी धारणायें वदठ जायंगी, उनके जीवन यशस्वी, सच्चे तथा ईमान- दार दोंगे। वे अपने कत्तर्या को सममेंगे। स्त्री पुरुप दोनों की तढाक का दक होगा; लेकिन तठाक देने की जरूरत न सममी जायगी | (१४)




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