बाल कालिदास | Bal Kalidas

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Bal Kalidas  by पंडित रूप नारायण - Pandit Rupnaryen

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रघुबश ७ तात्पये यह है कि प्रतापशाल्ञी राजा के रहते प्रजा का किसी तरह का कष्ट नहीं द्वोता । 0 । पर्य्यायपीतसय सुरैंहि माशो- कलाक्षय श्छाघ्यतरो हि बृद्धेः ॥ १६ ॥ पारी पारी करके देवता ल्लोगों के पी जाने से ( क्ष्योंकि चन्द्रमा अम्ृतमय है, और अम्रत द्वी देवता लोगों का भाजन है ) जे चन्द्रमा की कल्लाएँ धदती हैं, वह उनका घटना घढने की अपेक्षा सराहनीय है| १६ || तात्पये यद्द कि अपनी जातिवाल्लो का दुख मिटाने में दवेनेवाज्ञी दरिद्रता अ्रमीरी से कही बढ़कर है । ( ८) # # # निगलितास्थुगर्भम्‌ शरदूधन नादेति चातऊराउपि ॥ १७१1 पानी की वर्षा करके ख़ाक्ली हे! गये शरद्‌ ऋतु के वादत्न का चातक भी ( पानी के लिए ) नहीं दिक्‌ करता ॥ १७॥ झर्थात्‌ दान करने से दरिद्वावस्था को प्राप्त दानी मनुष्य को, समझदार लोग, श्राप प्रह्मन्त दरिद्र द्वेकर भी, मॉग- समॉगकर पीड़ा नहीं पहुँचाते । ( १६ ) उ९्णत्वमग्न्यातपसंप्रयोगात्‌ शेत्य' हि यत्‌ सा प्रकृतिजेलत्य ॥ ४७ ॥




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