स्वतंत्र्योत्तर कथा - लेखिकाएँ | Savatantryottar Katha Lekhikaen

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्रीमती मत्यवरती माँ लक र्३देशवावआमता मह्लिक ने जपती कहानिया में सामाजिक समस्याओं वा जपला पातावी बयब्तिक समस्याओं वा अवन विया है। कतिपय कहानिया में विशप के सामायीकरण हारा कछ परिणाम निशिवत विय जा सकत हैं किन्तु 1विका की जार स एसाकोई आग्रह नहा ह। फिर नी जत्यन्त विरत कहानिया मे यते तब समकाजीन सम्यताव विषय मे जो व्यग्यपूण सकत किये गए है व उवेयनाग है । उत्पहरणाय बुत तथा पर जो चरा जा शीपक गे पा मे राहदी सम्यता के प्रति ददु व्यग्य दप्ट य हैं(७) बडे बडे सम्य नगरा मे जहा एस पाली माँगना भी सवाक से बोहर हैं बहा “मं धार जकाव के जमाने भें भो इधर दटाता मे भसयाला घर छाठ्क जिए अवश्य यहा होगा ऐमा उतवा जनुमाव था। ”(जा) बह नह्दा जानता था दि मलानी मवार उस दुनिया से जा रहा है. जहा मरना नाना भारा डकता घाखा बादि ततिव भा जनाखी बातें नहा । जीवन के मृल्य जहा प्रतिशण बहन रह हैं। किसी वी स्मृति से चार आँसू बहाने का नी जहा जवकारा महा जौर व 4 या मिलन पर हए प्रन्‍ट वरना भी जहाँ उपहास जयवा बारी भाजुपता टिया जाता है और मनुष्य का मत विरातर यह सत्र सहत सख्त माना चट्टान सा अनता जा रहा है।मीलम चीपक जास्यायिका क॑ पूर्वाद्ध म नावस नामक जब (जा उक्त कहाना बा नामक है) ब। बह बताकर भारत विभाजन के समय घटित जूटमार मारकाट आाटि के “यग्यात्मक चित्र अवित किय गए ह। उत्पहरणाथ एक उक्ति बवलोव नाथ ह-- हित के बारर बज थ। पर चारा जौर जदभुत सनारा था दान टिन का लगाताद माबपर जूठमार के जनातर भी लाग अधावुता दुकाना बरामटा, खघ्माव काना मे नेदिया वी भाति छिप बढ थ। पुलिस की लाही तनिक आप निकल ता व यूटन दौश।प्रवृत्ति वी का वित्राशन करते समय सत्यवती जी ने विगेष तमगता का परिचय लिया है। वा मीर के वबतीय प्रदयों (पहलगाँद थ्रानगर चटमवाडी गुलमग आदि) व हिमाच्छाटित चारिया माी, बला नाता, सीजा, जलप्रपाता आदि वा वणन वरते समय व धाम विस्मृत-सी हवा उठी है ! नूरी, माता वा लड़का सारी हूल्य की साथ, पर जो घवा जाता हुसर, द दा स्घृति एक ऋण, नाहवाना आानि जनक कहानिया मे विविष प्राइतिक दुष्मा वो सुलर अवतारणा हुई है। नारी हृदय बी साथ! और१ चगात्म की रात पृष्ठ १० २ बधावकी रात पष्ठ ८३ बडे ३ बारां हृदय कर साथ पच्ट १६




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