अथर्ववेद संहिता भाषा | Atharvaved Sanhita Bhasha - Bhashya (pratham Khand)

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Atharvaved Sanhita Bhasha - Bhashya (pratham Khand) by जयदेव शर्मा - Jaydev Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(२) दी. ऋग्वेद का ज्ञाता होता, यजर्वेद का ज्ञाता दायर रु स्यग के जाता झद्राता और अ्थवेवेद का ज्ञाता ब्रह्मा चारो है , गप में संत फर हं सलिये ब्रह्मा सम्बन्धी बह्मवेद या अथवे- 4८ का 4 इस, प्रर १ के न + 1 पर चाय का बती उब्दन्त न हो। जिन तेत्तिरीय आदि याजुप शाखा के अन्त में सान गेट के; उहपना है उनमें ही अथवोप्विराविद ' ब्रह्मा को धरम फरगे आर उसे पर शो भी स्वीकार किया गया है। जैसे ऐत्तरेय भें सं के थी लग भगलाये हैं एक वाणी और दूसरा मन । वाणी कधोग भगी यिद्धा सर काथा यज्ञ और मन से शेप आधा यज्ञ बद्मा द्वारा समब्धादिंग शोगा 58 । इस» फ्तिरिक्त अथर्व-पेद के मन्त्र, । भी जेमिनीय पह भ ४ क्ीर्णा रुप ४:४६, साम, यजा, पादव्यवस्था, गान, ओर गय छपगलथ से ४ उस झक्ृपा बेदता में कोई संदेह नहीं है । जिनको फिर न साइुए ती उस द दिर्यात फे लिये इतना लिखना पर्याप्त होगा कि चारा करत ॥ परशारा सा ' रञ प्रजापति से उत्पत्ति हुई है, इसका निदुर्शक | पद पा सन्भ्र प्रमाण हे--- सबंहुत ऋच: सामानि जज्षिरे ४००7० र₹ तस्नात्‌ यजुस्तस्माद अजायत ॥ क्षृत3 ६4१1 ५ | छत यजु० ३३ | ७ ॥ .अथधवे० १७] ६। १३ ॥| इसी का अनुवाद करने हारा स्का ब्रह्म-विपयक मन्त्र यह है-- . यस्माइचो5पातक्ष्‌ यजवेस्मादपाकपन । सामानि यस्य लोसास्यशर्वारिगस्सों सुखम । सकने तें जूरि कम: स्थिढेंव सा ॥ छाणचे० ६०)।७। २६ ॥| कक ७ 9 १ ७9 तक डपरोक् दोनों सस्ता से चारों नेदा या चारा -टि खा शपह्त होता है। जब पेद्‌ कर गा! हैं... जे फे ही भीतुदु/चारें पाए नास उल्हेख हू तब सबके . प्याख्यार गए आहाख




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